बैसाखी पर्व (Baishakhi 2020) मुख्य रूप से किसानों का त्योहार है, जो उत्तर भारत के राज्यों में मनाया जाता है। खासकर पंजाब और हरियाणा के लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन इस साल इस पर्व की रौनक फीकी रहने वाली है। क्योंकि कोरोना वायरस के चलते पूरे देश में लॉक डाउन लागू है। कृषि के अलावा यह त्योहार अन्य मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है। प्रति वर्ष यह वर्ष 13 या 14 अप्रैल के दिन मनाया जाता है। इस साल बैसाखी पर्व 13 अप्रैल, सोमवार को है।
Baishakhi 2020: भांगड़ा-गिद्दा के साथ मनाया जाता है बैसाखी पर्व, सिखों के लिए बेहद खास होता है ये त्योहार
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क्यों मनाया जाता है बैसाखी पर्व?
वैशाख माह में रबी (अक्टूबर-नवंबर) की फसल के पक कर तैयार होने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है। किसान अपनी फसल की कटाई के बाद इस त्योहार के रूप में जश्न मनाते हैं। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों को बैसाखी पर्व की बधाइयां देते हैं और उत्तर भारत में कई जगह मेले भी लगते हैं।
यह पर्व सिख समुदाय के लोगों के लिए बेहद खास होता है। दरअसल सिख समुदाय की मान्यता के अनुसार, बैसाखी पर्व उनके लिए नए साल के आगमन का पर्व है। कहा जाता है कि बैसाखी के ही दिन साल 1699 में सिखों के अंतिम गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। खालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य आम लोगों की मुगलों के अत्याचारों से रक्षा करना था।
बैसाखी पर्व का ज्योतिषीय महत्व
बैसाखी पर्व का ज्योतषीय महत्व भी है। दरअसल इस दिन मेष संक्रांति होती है। मेष संक्रांति से आशय सूर्य का मेष राशि में प्रवेश से है। मेष राशि में सूर्य का आना सौर नववर्ष की शुरुआत होती है। इसी राशि से सूर्य राशिचक्र में अपने संचरण की पुनः शुरुआत करता है, जिसे वह एक वर्ष में पूरा करता है।
ऐसे मनाया जाता है बैसाखी का त्योहार
बैसाखी कृषि से जुड़ा लोक पर्व है इसलिए इस पर्व में लोक कला की झलक साफ देखने को मिलती है। पंजाब में लोग इस पर्व को ढोल-नगाड़ों की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा नृत्य के साथ मनाते हैं। लोग अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं और उन्हें इस पर्व की बधाइयां देते हैं। वहीं गुरुद्वारों में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। घर-घर में तरह-तरह के पकवान भी बनाए जाते हैं और लोगों को दावत दी जाती है। आज ही के दिन किसान अपनी फसल के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होते हैं।