Ashadh Gupt Navratri 2021: शुभ योग में गुप्त नवरात्रि, पुष्य नक्षत्र में शुभारंभ और अबूझ मुहूर्त में होगा समापन
- गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 11 जुलाई को रवि पुष्य योग साथ होगी और समापन अबूझ मुहूर्त भड़ली नवमी पर होगा।
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Ashadh Gupt Navratri 2021 Date: गुप्त नवरात्रि 11 जुलाई से आरंभ हो रहे हैं। इस बार गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ और समापन बहुत ही शुभ नक्षत्र के योग में होने जा रहा है। गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 11 जुलाई को रवि पुष्य योग साथ होगी और समापन अबूझ मुहूर्त भड़ली नवमी पर होगा। शक्ति साधना का सबसे महत्वपूर्ण पर्व नवरात्रि को सनातन धर्म का सबसे पवित्र और ऊर्जादायक पर्व माना गया है। एक वर्ष में चार नवरात्रि होते हैं। इनमें दो को गुप्त और दो सामन्य कहे गए हैं। गुप्त नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा और वर्षा ऋतु के मध्य आरंभ होता है। यह नवरात्रि गुप्त साधनाओं के लिए परम श्रेष्ठ कहा गया है। इस समय की गई साधना जन्मकुंडली के समस्त दोषों को दूर करने वाली तथा चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और कोक्ष को देने वाली होती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण समय मध्य रात्रि से सूर्योदय तक अधिक प्रभावशाली बताया गया है।
निगम शास्त्र में संपूर्ण विश्व की रचना का आधार सूर्य को माना गया है। 'सूर्य रश्मितो जीवो भी जायते' अर्थात- सूर्य की किरणों से ही जीव की उत्पत्ति हुई अतः सूर्य ही जगतपिता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष के नवरात्रि में सूर्य का निवास 'अनाहत चक्र' में होता है जिससे इसका वर्ण अरुण होता है। यही अरुणवर्ण शक्ति का प्रतीक है। इसके बारह दल बारह राशियों के प्रतीक बताए गए हैं। सूर्य की संक्रांतियों के अनुसार ही नवरात्रि पर्व माना गया है जैसे, गुप्त नवरात्रि आषाढ़ संक्रांति और मकर संक्रांति के मध्य पढ़ते हैं। यह सायन संक्रांति के नवरात्रि हैं जिनमें मकर संक्रांति उत्तरायण और कर्क संक्रांति दक्षिणायन की होती है। बाकी दो गुप्त नवरात्रि के अतिरिक्त सामान्य नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसी तरह यह गुप्त नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा और वर्षा ऋतु के मध्य आरंभ होता है।
वर्षा ऋतु के मध्य पड़ने वाला ये नवरात्रि गुप्त साधनाओं के लिए परम श्रेष्ठ कहा गया है। सूर्य की आषाढ़ संक्रांति के मध्य सभी देवता आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक शक्ति की आराधना करते हैं दसवें दिन पारण करके एकादशी के दिन सभी देवता शयन करने चले जाते हैं। यही आषाढ़ शुक्ल एकादशी देवशयनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। चार माह के शयन के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को
फिर देव जागते हैं जिसे हरिप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।
इन चार माह में देवताओं के शयन के परिणाम स्वरुप आग्नेय एवं ऐन्द्रप्राण की शक्ति कम हो जाती है और आप्यप्राण यानी आसुरी शक्तियों का बोलबाला रहता है। इन आसुरी शक्तियों का प्रभाव कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तक रहता है जिसे आप नरक चतुर्दशी भी कहते हैं। यही दरिद्रता की देवी नृऋती की अंतिम अवधि है। इनके दुष्प्रभाव से बचने के लिए गुप्त नवरात्रि में शक्ति आराधना का अति महत्व हैं। इनके कोप से
दैवी आपदा, पुत्र संतान और वैधव्य की आशंका रहती है।
इस गुप्त नवरात्रि में दुख के मूल कारण रूद्र, वरुण और नृऋती की आराधना से एक दैविक औरभौतिक त्रिबिध तापों से मुक्ति मिलती है। तांत्रिक जगत में इस नवरात्रि का अधिक महत्व होता है क्योंकि, देवताओं के शयनकाल के समय आसुरीशक्तियों की साधना करने वालों को अपनी मंजिल तक पहुंचना आसान रहता है। सामान्य जन इसमें मंत्र जाप और पूजा पाठ करके अपनी शक्तियों को बढ़ाकर इन चार दुखों के देवताओं के प्रकोप से बचे रहते हैं।
गुप्त नवरात्रि के मध्य 'माँ आदि शक्ति का महामंत्र
'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का प्रतिदिन जप करने से समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है।