नृत्य सीखने में उम्र बाधक नहीं, लग्न और परिश्रम जरूरी: गीता चंद्रन
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मीडिया जगत से शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कदम रखने वाली पद्मश्री गीता चंद्रन का कहना है कि केवल 5 वर्ष की उम्र से उनकी नृत्य के प्रति दीवानगी रही है। तभी से भारत नाट्यम का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था।
गीत-संगीत और नृत्य एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्हें सीखने में उम्र बाधा नहीं होती। केवल सच्ची लग्न और परिश्रम जरूरी है। तभी नृत्य और संगीत विधा में पारंगत होकर नृत्य की कला रूपी प्राचीन धरोहर को लुप्त होने से बचाया जा सकता हैै।
पांवटा पहुंचीं पद्मश्री गीता चंद्रन ने पांवटा साहिब गुरुद्वारा में शीश नवाने के बाद अमर उजाला से बातचीत में कहा कि उन्होंने अपने गुरुओं में स्वर्णा सरस्वती और केएन दक्षिणामूर्ति से नृत्य सीखा है।
तमिल ब्राह्मण परिवार से हैं
कर्नाटक संगीत मीरा शेषाद्री से सीखा है। शास्त्रीय और कर्नाटक संगीत में दक्षता प्राप्त की। उन्होंने कहा कि नृत्य सीखने वाले को संगीत का बेहतर ज्ञान रखना भी जरूरी है। वे तमिल ब्राह्मण परिवार से हैं।
नृत्य सीखने पर शुरू में दिक्कतें आती रहीं। नृत्य प्रशिक्षण व कर्नाटक संगीत की शिक्षा के साथ पढ़ाई भी करती रहीं। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से गणित में ऑनर्स किया। आईआईएमसी से एडवरटाइजिंग की पढ़ाई की है।
एक मीडिया कंपनी में नौकरी भी की है, लेकिन कॅरिअर के रूप में शास्त्रीय नृत्य को चुना। पद्मश्री गीता ने कहा कि नृत्य के माध्यम से से पर्यावरण संरक्षण, महिला उत्पीड़न और अनैतिक अपराधों के खिलाफ भी वे विरोध प्रकट करती हैं।