इनका दर्द बांटने के लिए लालचंद ने छोड़ दी IAS की नौकरी
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1979 में भारतीय सिविल सेवा (एलाइड सर्विस) की परीक्षा पास की। अंडर सेक्रेट्री का पद मिला और ज्वाइन भी किया। लेकिन बचपन से जन्म आधारित जातीय भेदभाव का दर्द लगातार बढ़ता जा रहा था। सात साल में यह दर्द इतना बढ़ गया कि दलितों से भेदभाव के सामने दुनिया की तमाम सुविधाएं कम पड़ रही थीं।
लिहाजा, इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष का फैसला लिया। 1987 में नौकरी छोड़ दी और शुरू हुआ दलितों के उत्थान का संघर्ष। कठिन रास्तों में यह मशाल उठाकर चलने वाले हैं लाहौल स्पीति के जहालमा गांव में जन्मे लालचंद ढिस्सा।
ढिस्सा ट्राइबल दलित हैं। ढिस्सा के लंबे संघर्ष के बाद आखिर 2004 में एसटी दलितों को अनुसूचित जनजाति के साथ अनुसूचित जाति दोनों का दर्जा मिलना शुरू हुआ। ढिस्सा की कोशिशों का ही नतीजा था कि ऐसा करने वाला हिमाचल देश का पहला राज्य बन गया।
जनजातीय दलित संघ की स्थापना की
2007 में स्पीति के कुछ लोगों के दबाव से दलित समुदाय के 16 बच्चों को बौद्ध भिक्षु बनने से रोक दिया गया। ये बच्चे कर्नाटक के एक मठ में बौद्ध भिक्षु बनने गए थे। बहिष्कार के डर से इन बच्चों को मठ से निकाल दिया गया। ढिस्सा ने इस मसले को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और धर्मगुरु दलाईलामा से उठाया। नतीजतन, इन बच्चों को दोबारा मठ में बुला लिया गया।
2004 में ढिस्सा ने राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय दलित संघ की स्थापना की। यही नहीं, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्था मैसूर के 2006 में लेसर नॉन लेंग्वेजिज ऑफ इंडिया नाम से आयोजित प्रोजेक्ट में ढिस्सा ने लाहौल के दलित समुदाय की बोली जाने वाली भाषा के नाम को चिनाली की बजाय चिनलभाषे बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने एक शब्दकोष तैयार किया है जिसमें करीब 10 हजार शब्दों का संग्रह है। शोध के आधार पर उन्होंने दावा किया है कि चिनलभाषे का संस्कृत से सीधा संबंध है।