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गायों को चराते-चराते किया रियाज, अब युवाओं के पसंदीदा लोकगायक

Mon, 29 Jul 2019 01:34 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Mon, 29 Jul 2019 01:34 PM IST
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himachali folk singer partap bhardwaj success story
- फोटो : अमर उजाला

युवा लोकगायक प्रताप भारद्वाज ने बचपन में गायों को चराते-चराते चरागाहों में गाने का खूब रियाज किया। अब युवाओं के पसंदीदा लोकगायक बन गए हैं। जमा दो के बाद पढ़ाई छोड़कर अब 23 साल के इस युवा लोकगायक ने लोेकगायन को ही अपना कॅरिअर बना लिया है। प्रताप मशहूर लोकगायक मोहन सिंह चौहान और नाटी किंग कुलदीप शर्मा को आदर्श मानते हैं। 

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प्रताप का एक वीडियो और चार ऑडियो सोशल मीडिया पर खूब धूम मचा रहे हैं। इन्हें लाखों दर्शक पसंद कर रहे हैं। ‘मेरी तमन्ना’, ‘दिलजले’, ‘सुहाने सपने’ और ‘दिल मिल गए’ जैसे उनके गीतों के संकलन खूब देखे-सुने जा रहे हैं। सबसे ज्यादा मशहूरी उन्हें ‘दिलजले’ संकलन से मिली है। प्रताप भारद्वाज सिरमौर और सोलन में बड़े मंच चुके हैं। वह अपने जिले में प्रशासन की ओर से मंचों पर नहीं बुलाए जाने से खफा भी हैं।
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प्रताप कहते हैं कि लोकगायकी का उन्हें शुरू से ही शौक था। मूल रूप से वह शिमला जिले की ठियोग तहसील की क्यार पंचायत के सनाहू गांव के निवासी हैं। स्कूल टाइम में 11 साल से गायन शुरू कर दिया था। वह मोहन सिंह चौहान और कुलदीप शर्मा की तरह गाना चाहते हैं। वह कहते हैं कि उन्हें सिखाया किसी ने नहीं। बस प्रैक्टिस करते रहते हैं। बचपन में जब छठी में पढ़ता था तो 11-12 साल की उम्र में गायों को चराने का काम होता था।
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वह चरागाह में गायों के बीच जाकर गाते। गायें ही उनकी प्रारंभिक श्रोता हैं। अब घर में खूब रियाज होता है। हारमोनियम, की-बोर्ड, ढोलक आदि सब उसके पास हैं। वह केवल पारंपरिक गीत गाते हैं। लोकगीतों से छेड़छाड़ के पक्ष में नहीं हैं। अभी तक उन्होंने किसी को कॉपी भी नहीं किया है। प्रताप भारद्वाज का कहना है कि उनके पिताजी रमेश चंद, माता बिमला भारद्वाज और चाचा गौरीदत्त शर्मा से बहुत प्रोत्साहन मिलता रहा है। इसी वजह से मुकाम की ओर निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

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