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न रेगुलर, न अनुबंधकर्मी खुश

Mon, 07 Apr 2014 05:30 AM IST
Shimla
Shimla Updated Mon, 07 Apr 2014 05:30 AM IST
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शिमला। हिमाचल की राजनीति में सरकारी कर्मचारी बड़े ‘खिलाड़ी’ माने जाते हैं। प्रचलित कहावत है कि कर्मचारी साथ नहीं तो तख्त और ताज बदल जाते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले एक ओर रेगुलर कर्मचारी नाखुश हैं, तो अनुबंध कर्मचारी परेशान।
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कांग्रेस सरकार को बने 15 महीने हो गए। इस बीच कर्मचारियों की दिक्कतों को हल करने के लिए संयुक्त सलाहकार समिति (जेसीसी) की बैठक तक नहीं हुई। सीएम की अध्यक्षता में आखिरी बैठक पूर्व भाजपा सरकार में जुलाई 2012 में हुई थी। कर्मचारियों की 27 कैटेगिरी आज भी पंजाब आधार पर संशोधित ग्रेड पे/पे बैंड मिलने का इंतजार कर रही हैं। 4-9-14 का लाभ 2012 के बजाय 2009 से देने का वादा आज तक पूरा नहीं हुआ। पूर्व सरकार के समय जिन्हें संशोधित ग्रेड पे मिली, उन पर शर्त लगा दी कि अगली पदोन्नति 4 साल बाद मिलेगी। ये शर्त भी नहीं हटी। पंजाब आधार पर राजधानी भत्ता, मेडिकल भत्ता और टीए-डीए जैसी मांगें भी पूरी नहीं हुई।
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राज्य में सरकार बदलने के बाद अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ भी बदला, लेकिन दो संगठन बने। ये अपने काम के लिए कम, अन्य गतिविधियों के लिए ज्यादा विवादित रहे। आज किसी भी महासंघ को सरकार से मान्यता नहीं है। गुटों में बंटा महासंघ रुतबा खो रहा है। ये ही कर्मचारियों की पीड़ा है। कांग्रेस ने घोषणा पत्र में वादा किया था कि अनुबंध कर्मियों को 5 साल में रेगुलर करेंगे, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। हालांकि इस अवधि में एक काम कर्मचारियों को पसंद आया। हर विभाग में रुके हुए प्रमोशन मिले। लेकिन इसी से जुड़ा 85वें संविधान संशोधन का मसला अब भी सरकार के गले पड़ा हुआ है। प्रमोशन में कांसिक्वेंशियल सीनियोरिटी न मिलने के खफा एससी-एसटी कर्मचारी सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका के साथ सप्रीम कोर्ट गए हैं।
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इनसेट-1
कर्मचारियों की संख्या और वेतन
कुल सरकारी कर्मचारी 2,26,382
सालाना वेतन खर्च 7647 करोड़
महकमों में खाली पद 35000
हर साल रिटायरमेंट 5800
(स्रोत : बजट 2014-15)
इनसेट-2
हिमाचल सरकार की मुश्किल
13वें वित्तायोग ने कर्मचारियों के वेतन पर होने वाले खर्च को कुल राजस्व खर्चे से पेंशन और ब्याज भुगतान घटाकर 35 फीसदी पर बांध रखा है। केवल 2014-15 के ही बजट को लें तो राजस्व खर्चा 19784 करोड़ है। इसमें से 3496 करोड़ पेंशन और 2750 करोड़ ब्याज भुगतान घटा दें तो 13538 करोड़ का केवल 35 फीसदी कर्मचारियों पर खर्च होना चाहिए। लेकिन इस साल वेतन पर 7647 करोड़ यानी इसका 56 फीसदी खर्च हो रहा है। वित्तीय संसाधन न होने के कारण कर्मियों की संख्या बढ़ाने के बजाय घटाने का दबाव है।

भाजपा सरकार ने भी टुकड़ों में दिए लाभ
पूर्व भाजपा सरकार ने भी कर्मचारियों को देय लाभ एकमुश्त नहीं, बल्कि टुकड़ों में दिए। धूमल सरकार के समय केंद्र सरकार का छठा और पंजाब का पांचवां वेतन आयोग लागू हुआ। इसे लागू करने पर भाजपा सरकार ने भी अपने शर्तें लगा दी। एरियर किश्तों में दिया। टाइम स्केल का लाभ पंजाब की तरह 2006 से लागू न कर इसे 2009 से नोशनल कर दिया। हालांकि 2012 के चुनावी साल में सरकार ने अन्य मांगें तो मान ली, लेकिन फार्मूले को अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर। 85वें संविधान संशोधन का मसला कोर्ट में होने के कारण तक प्रमोशन भी रुकी रहीं।


इनसेट-3
कौन कर्मचारी संघ क्या कहता है?
(1)
15 महीने में जेसीसी की एक भी बैठक न होना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन ये सब अफसरों की वजह से हुआ। हम तो लड़ रहे हैं कि किसी को तो मान्यता दे दो। मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव के बाद मसले हल करने का आश्वासन दिया है। कांग्रेस ने चुनाव घोषणा पत्र में हमारे मुद्दे शामिल किए हैं, इसलिए इंतजार करना चाहिए।
- एसएस जोगटा, अराजपत्रित महासंघ के एक गुट के अध्यक्ष।
(2)
दो समानांतर गुटों ने कर्मचारी राजनीति को बर्बाद कर दिया। 15 महीने में 20 रुपये दिहाड़ी बढ़ाने की घोषणा की, वो भी लागू नहीं हुई। हमने 100 फीसदी वृद्धि करवाई थी। अनुबंध कर्मचारियों से धोखा हुआ। बिना फेडरल हाउस किए किसी सरकार को समर्थन देना भी गलत है। हमारा संगठन गैर राजनीतिक है और रहेगा।

- सुरेंद्र ठाकुर, मान्यता प्राप्त पूर्व अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष।
(3)
कर्मचारियों के असल मसले दब गए हैं। किसी महासंघ को इसकी चिंता नहीं। कभी अलग वेतन आयोग बनाने की बात हो रही है तो कभी प्रशासनिक ट्रिब्यूनल दोबारा खोलने पर समय बर्बाद हो रहा है। इनमें कर्मचारियों का हित नहीं है। सरकार ट्रांसफर पॉलिसी पर सख्ती से अमल करवाए और जेसीसी में सभी संघों को बुलाए।
- विनोद कुमार, कर्मचारी परिसंघ के प्रदेश अध्यक्ष।
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