भाजपा शासित राज्यों में क्यों गायों की कत्लगाह बनीं गौशालाएं?
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गुजरात में मृत गायों की चमड़ी उतारने को लेकर पीटे गए कुछ दलित युवकों की वीडियो सामने आते ही देशभर में हाहाकार मच गया। ये खबर तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खियां बनी और आज भी अखबारों के तमाम पन्ने गाय बनाम दलितों की लड़ाई में रंगे हुए हैं।
लेकिन इस खबर को उतनी सुर्खियां नहीं मिल सकीं कि राजस्थान के जयपुर की एक गौशाला में दो महीने में ही 1500 से ज्यादा गायों ने दम तोड़ दिया इनमें से 200 गाय तो एक हफ्ते में ही मरी हैं। ध्यान इस खबर पर भी नहीं गया कि कैसे मध्यप्रदेश के ग्वालियर की एक गौशाला में चार महीने में 1200 के करीब गायों की मौत हो गई।
गौर करने वाली बात ये है कि इन गायों के मारे जाने की वजह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि सरकारी लापरवाही और घटिया रखरखाव की वजह से बेजुबान गायें एक एक कर मौत के मुंह में चली गई। राजस्थान में गौशाला के कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से गायों को बेमौत मरने के लिए छोड़ दिया गया।
नतीजतन चारे और साफ सफाई के अभाव में 1500 से ज्यादा गाय कर्मचारियों की हड़ताल की बलि चढ़ गई। जरा उस मंजर पर गौर कीजिए जिमसें लगातार बारिश और गोबर के कारण खुली गौशाला में कई कई फुट तक दलदल भर गई हो।
राजस्थान की गौशाला में देखभाल के अभाव में मर गई 1500 गायें
इसी दलदल में सैकडों गाय इस कदर तडपती रही कि न उन्हें कोई चारा देने वाला मिला न पानी। दलदल में फंसे होने के कारण वह खुद भी बाहर आने की स्थिति में नहीं थी और उन्हें इससे बाहर निकालने की जहमत किसी ने उठाई नहीं।
हैरत की बात ये है कि यह सिलसिला दो चार दिन नहीं बल्कि महीनों चला। यहां मौत के इंतजार में तडपती गायों की चित्कार उन कथित गौ रक्षकों के कानों तक भी नहीं पहुंच सकी जिनकी पूरी रोजी रोटी इनके सहारे चलती है और न ही उस सरकार के कानों तक जो खुद को इनकी रक्षक होने का दावा करती है।
ये मामला शायद खुलता भी नहीं अगर राजस्थान हाईकोर्ट ने इस पर राज्य सरकार को फटकार न लगाई होती। कोर्ट की फटकार के बाद मामला मीडिया में आया तो अब लीपापोती का दौर शुरू हो चुका है।
अब बात एक और भाजपा शासित राज्य की। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में नगर निगम की गौ शाला में कुछ कुछ वो ही नजारा देखने को मिला जो राजस्थान की हिंगोनिया गौशाला में रहा।
ग्वालियर की गौशाला में भी लापरवाही की भेंट चढ़ी 1200 गायें
लगभग 60 बीघा में बनी गौशाला में दो हजार के करीब गायों की देखभाल के लिए 70 से ज्यादा कर्मचारियों का स्टाफ है और 450 करोड़ का सालाना बजट। लेकिन यहां गायों की हालत देखकर लोगों का कलेजा मुंह को आ जाए।
चारा पानी के अभाव में मरी गाय और गोवंश के शव और अवशेष गौशाला में जहां तहां पड़े हैं। कहने को तो गौशाला में इनकी देखभाल के लिए कर्मचारी भी हैं और चिकित्सक भी, लेकिन उनमें से किसी की निगाहें एक एक कर मरती गायों पर नहीं पड़ती।
आलम ये है कि दो माह में ही यहां भी चार माह में 1200 से ज्यादा गायें मौत के मुंह में समा चुकी हैं। गायों की ये मौत इतनी खामोश है कि किसी की निगाह इस पर नहीं जाती।
मीडियाकर्मियों के कैमरे ही मौतों के इस सन्नाटे को तोड़ते हैं। खास बात ये है कि गायों की यह दुर्दशा जिस राज्य में हो रही है वहां भी भाजपा की सरकार है। लेकिन गायों की कत्लगाह बनी इन गौशालाओं पर न किसी सरकार की निगाह पड़ती है और न उन गौ रक्षकों की जो इसके लिए किसी का खून बहाने से भी नहीं चूकते। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि थोक के भाव इन गायों की मौत का जिम्मेदार कौन है और कातिल कौन?