फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Rajasthan ›   vasundhara raje and Amit Shah can play Miracle in Rajasthan assembly elections

राजस्थान में कई गुल खिला सकता है वसुंधरा बनाम शाह का पेंच

Thu, 18 Oct 2018 09:21 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 18 Oct 2018 09:21 PM IST
विज्ञापन
vasundhara raje and Amit Shah can play Miracle in Rajasthan assembly elections
अमित शाह और वसुंधरा राजे

राजस्थान से कांग्रेस और भाजपा दफ्तर आने वाले किसी भी कार्यकर्ता से यह पूछने पर राज्य में भाजपा को वसुंधरा हरा रही हैं, दोनों के भाव एक जैसे मिल रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस के दफ्तर आए कार्यकर्ता पहले मुस्कराते हैं, फिर हां में हां का संकेत देकर सिर हिलाते हैं और इसके बाद ताजा हालात बयां करने लगते हैं। दोनों की राय में राजस्थान में भाजपा एकजुट होती दिख रही है, लेकिन एकजुट होकर चुनाव का सामना नहीं कर रही है। इसका कारण भी वसुंधरा राजे और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच पेंचीदा पेंच बताया जा रहा है।

विज्ञापन


वसुंधरा ने कसा शाह के दौरे से किनारा

टीम वसुंधरा के सूत्र की माने तो शुरू में कई दौरे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के ऐसे हुए, जिसमें वसुंधरा नहीं गई। वसुंधरा के कई अहम कार्यक्रम में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने होने के बाद भी शिरकत नहीं की। इसके बारे में दोनों ही टीमों के नेता अलग अलग तर्क देते रहे। वसुंधरा विरोधी टीम भाजपा के नेताओं के अनुासार एक ही स्थान पर दो बड़ी हस्तियां प्रचार के क्रम में एक साथ क्यों ताकत लगाकर समय जाया करें।
विज्ञापन


वहीं, टीम वसुंधरा के मुताबिक यही तो तकनीकी पेंच है। इसका समाधान खुद भाजपा अध्यक्ष को करना है। बुधवार 17 अक्टूबर को भी वसुंधरा दिल्ली आई थी। एक घंटे से अधिक समय तक अरुण जेटली से उनकी मुलाकात हुई। वसुंधरा ने इस दौरान राजस्थान के कुछ बकाया आदि के भुगतान पर चर्चा की और वह फिर राजस्थान लौट गई। नई दिल्ली में किसी बड़े नेता से उनके भेंट मुलाकात की कोई सूचना नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन

105 सीटों के पैनल और 95 जयपुर के लिए अटके

200 विधानसभा सीटों के चुनाव और टिकट निर्धारण के लिए भाजपा को पैनल तैयार करना था। इसमें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की देखरेख में 105 सीटों पर पैनल बनाने के लिए बाक्स में राय डलवाई गई। बाकी 95 सीटों के लिए कहा गया कि इसका निर्णय जयपुर में किया जाएगा।

टीम वसुंधरा को हाई कमान के ईशारे पर हुआ राजनीतिक दांव थोड़ा अखर रहा है। लेकिन उसे भरोसा है कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। भाजपा में एक चर्चा और है। 200 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर सूत्र बताते हैं 50 सीटों पर वसुंधरा की चल पाने के आसार हैं। 150 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन पर हाईकमान की चलने के पूरे आसार हैं। 

बताते हैं यही कारण है कि भाजपा पूरी ताकत से चुनाव में नहीं उतर पा रही है। वसुंधरा राजे की टीम के लोगों को गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल, भूपेंद्र यादव हजम नहीं हो रहे हैं। ओम माथुर के फालोवर भी काफी सक्रिय है।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तो बस मदनलाल हैं

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदनलाल सैनी के बारे में भी भाजपा के खेमे में तरह-तरह की चर्चा की है। राजस्थान से आने वाले एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि वह सीधे, सादे, उम्रदराज पार्टी के निष्ठावान नेता हैं, लेकिन वह मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के रहते कोई स्टैंड नहीं ले पाते। वसुंधरा विरोधी टीम के एक सदस्य के मुताबिक भले ही अशोक परनामी भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन वह मदनलाल सैनी से भी ज्यादा प्रभावित हैं।

अशोक परनामी के इस्तीफा देने के बाद वसुंधरा राजे ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया था। उन्होंने पूरे 74 दिन तक किसी को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनने दिया। वह पार्टी के केंद्रीय नेतत्व के सामने चट्टान की तरह खड़ी रही। राजस्थान भाजपा को मदनलाल सैनी के रूप में नया चेहरा मिला भी तो वसुंधरा की मंजूरी के बाद।

क्यों है इतना बड़ा तकनीकी पेंच

वसुंधरा राजे, भाजपा की संस्थापक राजमाता विजया राजे सिंधिया की पुत्री हैं। राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वह राजस्थान भाजपा के संगठन में एक बड़े हिस्से पर अच्छा खासा दबदबा रखती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी वसुंधरा की पकड़ ठीक-ठाक है। स्वभाव से ही नहीं वसुंधरा मिजाज से भी महारानी हैं। उनके बारे में आम है कि अट पीएम, नो सीएम(आठ बजे रात्रि के बाद मुख्यमंत्री उपलब्ध नहीं है)। 

वसुंधरा को राजनीति में पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह और पूर्व उपराज्यपाल, राजस्थान के मुख्यमंत्री, दिग्गज नेता भैरो सिंह शेखावत लेकर आए थे। उन्हें राजनीतिक कद देने में भी भूमिका निभाई, लेकिन जब राजनीति का अहम टकराया तो वसुंधरा ने हार नहीं मानी। दोनों से राजनीतिक कटुता ही नहीं मोल लिया, बल्कि उनके लिए राजस्थान भाजपा को भी अनजाना बना दिया। अपने स्वभाव के अनुकूल वसुंधरा विरोधियों को जरा सा भी स्थान नहीं दे पाती। वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच पर भी विरोधियों को बोलने का अवसर तक नहीं देती।

इसके सामानांतर राजस्थान भाजपा में वसुंधरा के विरोधियों की कमी नहीं है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से भी वैचारिक और व्यवहारिक मेल कम हो पा रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री जहां अपने राजनीतिक कॉरियर को देखकर चल रही हैं, वहीं भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व पार्टी के मूल्यों का हवाला देकर अन्य को अवसर देने की रणनीति पर चल रहा है। वुसंधरा के विरोधियों को भी राजस्थान में सुन रहा है।

क्या चाहती हैं वसुंधरा

राजस्थान विधानसभा चुनाव में भावी मुख्यमंत्री का बार-बार उम्मीदवार घोषित किया जाए। चुनाव के लिए होने वाली बैठक, तैयारी, रणनीति में उनका खासा दखल हो और टिकट बंटवारे में राजे की राय को अहमियत दी जाए। वसुंधरा के राजस्थान में राजनीतिक विरोधियों को उनकी क्षमता के अनुरुप ही भाव दिया जाए। 

बताते हैं वसुंधरा भविष्य की राजनीति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, वहीं भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व इन सब मामलों में पारदर्शिता, राज्य में सत्ता में वापसी, अन्य भाजपा नेताओं के महत्व को आगे रखकर विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed