अशोक गहलोत: पहले करते थे जादूगरी, अब बन गए हैं सियासत के 'जादूगर'

चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 14 Dec 2018 04:44 PM IST
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सियासत का जादूगर- अशोक गहलोत
सियासत का जादूगर- अशोक गहलोत - फोटो : Amar Ujala

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अशोक गहलोत...राजस्थान की राजनीति का वो कद्दावर चेहरा जिसका जादू मतदाताओं के सिर चढ़कर बोलता है। एक ऐसा नेता जो अपने सौम्य व्यवहार से न सिर्फ अपने समर्थकों का दिल जीत लेता है बल्कि विरोधी भी उनके अंदाज के कायल दिखते हैं। जिस सीट से वह विधानसभा चुनाव लड़ते हैं, वहां की जनता उन्हें हर बार सिर आंखों पर बिठाती है। पिता भले ही जादूगर थे, लेकिन वह राजनीति में रहकर लोगों पर जादू कर रहे हैं। आज राजस्थान की राजनीति में वह कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं। जब हाईकमान को केंद्र में किसी भरोसेमंद चेहरे की तलाश थी तो ये तलाश उनके नाम पर ही आकर खत्म हुई थी। आज वह कांग्रेस के संगठन महासचिव हैं और जनार्दन द्विवेदी के बाद इस बड़ी जिम्मेदारी को बखूबी संभाल रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में आज भी उनका पूरा असर रहा है और सीएम बनकर इसे साबित भी कर दिया है।  

पिता थे जादूगर 

अशोक गहलोत माली जाति से संबंध रखते हैं। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि उनके पूर्वजों का पेशा जादूगरी था। गहलोत के पिता स्व. लक्ष्मण सिंह गहलोत जादूगर थे। अशोक गहलोत ने भी अपने पिता से जादू सीखा था और कुछ वक्त के लिए इस पेशे को अपनाया भी। लेकिन यह उनकी नियति नहीं थी। उन्हें तो सियासत के मैदान में रहकर मतदाताओं पर जादू करना था और वह इसमें कामयाब भी रहे। 

कड़क चाय के शौकीन

अशोक गहलोत का स्वभाव बेहद सरल और सहज है। वह आम लोगों से जब मिलते हैं तो उनका कद उनके आड़े नहीं आता। उनका अंदाज ही लोगों को सहज कर देता है। उनमें कहीं भी एक बड़ा राजनेता होने का दंभ नहीं झलकता। यह बात मशहूर है कि वह अपनी गाड़ी में साधारण पारले जी बिस्किट रखते हैं। कड़क चाय के वह बेहद शौकीन हैं। और जब भी चाय की तलब लगती है तो सड़क के किनारे कहीं भी गाड़ी रोककर चाय पी लेते हैं। उनका यही अंदाज उनके जमीन से जुड़े नेता की छवि को और मजबूत करता है। 
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इसे अशोक गहलोत का जादू ही कहा जाएगा कि जिस राज्य में क्षत्रिय, जाटों और ब्राह्मणों का वर्चस्व हो, वहां माली जाति के इस नेता ने गहरी पैठ बना ली और दो बार राजस्थान का सीएम पद भी संभाला। 1998 में उन्होंने तमाम बड़े नेताओं की चुनौती के बीच सीएम पद संभाला। 2008 में भी उन्होंने अप्रत्याशित अंदाज में मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। अब 2018 में उन्होंने ग्वालियर राजघराने की बेटी और झालावाड़ राजघराने की बहू वसुंधरा राजे को सत्ता से बेदखल कर दिया।  
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