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राजस्थान कभी था जुरासिक डॉयनासॉर्स की जमीन
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 17 Feb 2014 02:41 PM IST
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एक समय राजस्थान ने ऐसा भी देखा है जब इसकी रेतीली जमीन पर ऊंट और इंसानों का नहीं बल्कि जुरासिक काल के डॉयनासार्स का राज था।
जी हां, जैसलमेर से लगभग दस किलोमीटर दूर थईयत गांव के नजदीक स्थित जैसलमेर जोधपुर हाईवे पर भूवैज्ञानिकों के एक जत्थे को अपनी खोज के दौरान 180 मिलियन साल पुराने दो डॉयनोसॉर्स के जीवाश्म मिले हैं।
युनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान के भूविज्ञान विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट धीरेंद्र कुमार पांडे के नेतृत्व में दुनिया भर से 34 वैज्ञानिकों का एक दल जैसलमेर बेसिन में डॉयनोसार्स के अस्तित्व की तलाश में निकता था।
अपनी खोज कें दौरान उन्हें एक सैंडस्टोन के पत्थर पर पांच सेंटीमीटर छोटे डॉयनोसॉर के पदचाप के निशान मिले। यही नहीं दल को जल्द ही एक नये और बड़े डॉयनोसॉर का जीवाश्म फिर मिला।
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इस जीवाश्म का फुटप्रिंट तीस सेंटीमीटर बड़ा था। खोज से उत्साहित होकर टीम के एक मेंबर कॉमिनियस युनिवर्सिटी के डॉ जैन स्कॉग्ल ने इन जीवाश्मों को देखते ही बता दिया कि छोटा जीवाश्म ग्रैरालेटर प्रजाति का है और बड़ा वाला थिरापॉड प्रजाति का है।
तस्वीरों को देखने के बाद लखनऊ युनिवर्सिटी के अशोक साहनी ने डॉ जैन की बात को विश्वसनीय मानते हुए दोनों जीवाश्म को जुरासिक काल का बताया।
जुरासिक सिस्टम के नवें इंटरनेशनल कांग्रेस समिट में उन 34 सदस्यों की टीम ने भाग लिया और डीके पांडे ने बताया कि हम 180 मिलियन सालों पहले राजस्थान के सामने तटीय इलाके के होने की संभवता हो सकती है।
इसी इलाके में जुरासिक नदी के होने और डॉयनोसॉर्स के होने की बात कही।
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जी हां, जैसलमेर से लगभग दस किलोमीटर दूर थईयत गांव के नजदीक स्थित जैसलमेर जोधपुर हाईवे पर भूवैज्ञानिकों के एक जत्थे को अपनी खोज के दौरान 180 मिलियन साल पुराने दो डॉयनोसॉर्स के जीवाश्म मिले हैं।
युनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान के भूविज्ञान विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट धीरेंद्र कुमार पांडे के नेतृत्व में दुनिया भर से 34 वैज्ञानिकों का एक दल जैसलमेर बेसिन में डॉयनोसार्स के अस्तित्व की तलाश में निकता था।
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अपनी खोज कें दौरान उन्हें एक सैंडस्टोन के पत्थर पर पांच सेंटीमीटर छोटे डॉयनोसॉर के पदचाप के निशान मिले। यही नहीं दल को जल्द ही एक नये और बड़े डॉयनोसॉर का जीवाश्म फिर मिला।
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इस जीवाश्म का फुटप्रिंट तीस सेंटीमीटर बड़ा था। खोज से उत्साहित होकर टीम के एक मेंबर कॉमिनियस युनिवर्सिटी के डॉ जैन स्कॉग्ल ने इन जीवाश्मों को देखते ही बता दिया कि छोटा जीवाश्म ग्रैरालेटर प्रजाति का है और बड़ा वाला थिरापॉड प्रजाति का है।
तस्वीरों को देखने के बाद लखनऊ युनिवर्सिटी के अशोक साहनी ने डॉ जैन की बात को विश्वसनीय मानते हुए दोनों जीवाश्म को जुरासिक काल का बताया।
जुरासिक सिस्टम के नवें इंटरनेशनल कांग्रेस समिट में उन 34 सदस्यों की टीम ने भाग लिया और डीके पांडे ने बताया कि हम 180 मिलियन सालों पहले राजस्थान के सामने तटीय इलाके के होने की संभवता हो सकती है।
इसी इलाके में जुरासिक नदी के होने और डॉयनोसॉर्स के होने की बात कही।