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Rajasthan Politics : क्या सचिन पायलट एक बार फिर रह जाएंगे खाली हाथ, कहां हो रही उनसे चूक

Tue, 27 Sep 2022 11:14 AM IST
रोमा रागिनी आशीष कुलश्रेष्ठ, संवाद, जयपुर
आशीष कुलश्रेष्ठ, संवाद, जयपुर Published by: रोमा रागिनी Updated Tue, 27 Sep 2022 11:14 AM IST
सार

अशोक गहलोत संकट भांपने में माहिर हैं। यही वजह है कि पर्यवेक्षकों के सामने गहलोत गुट ने एकजुटता दिखाई और बता दिया कि पायलट को वो सीएम नहीं स्वीकार करेंगे। वहीं चार साल में सचिन पायलट ने सीएम बनने के कई प्रयास किए लेकिन हर बार वो गहलोत से पिछड़ते नजर आ रहे हैं।

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Rajasthan Political Crisis Will Sachin Pilot not be able to become CM again
सचिन पायलट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान में एक बार फिर सियासी संकट है। पिछले चार साल से कांग्रेस को अपने ही नेताओं से सरकार गिराए जाने का खतरा बना हुआ है। नए सीएम को लेकर राजस्थान कांग्रेस पायलट और गहलोत गुट में बंट गई है। कहा जा रहा है कि अशोक गहलोत के पक्ष में 80 से अधिक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है।

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 अशोक गहलोत गुट के नेता लामबंद हो गए हैं। विधायकों ने अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष के पास पहुंचा दिया है। इसे भी राजनीतिक जानकार अशोक गहलोत की जादूगरी बता रहे हैं कि पायलट के पास आकर सत्ता एक बार फिर खिसक रही है। कुछ लोग इसे गहलोत का अनुभव भी बता रहे हैं कि ऐन मौके पर गहलोत ने फिर पासा पलट दिया है। क्या सचिन पायलट के पास जादूगरी और अनुभव नहीं है।

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चार साल में सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनाने का तीसरा प्रयास विफल होता नजर आ रहा हैं। चार साल तीन बड़े प्रयास और तीनों विफल हो गए। इस परिस्थिति में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने के अगला प्रयास करने से पहले राजनीतिक मंथन की सख्त आवश्यकता है। पायलट की लड़ाई उस नेता से है, जिसे मारवाड़ का गांधी कहा जाता है। गहलोत आम और खास दोनों के लिए आसानी से उपलब्ध नेता हैं।
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गहलोत आसानी से उपलब्ध नेता हैं, जो कहीं भी कभी भी मिल सकते हैं। कोई आम हो या खास समय जरूर अलग हो सकता है। वहीं गहलोत सियासी संकट भांपने में माहिर हैं। इसके साथ ही गहलोत के मन में क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता है। सबसे बड़ी और अहम बात ये है कि अशोक गहलोत के पास उन नेताओं की टीम है, जो गहलोत को मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहती है।




रविवार के ही पूरे घटनाक्रम को देखे तो अशोक गहलोत जयपुर में मौजूद ही नहीं थे। शांति धारीवाल ने अपनी पूरी ताकत लगा कर कल विधायक दल की बैठक को रोक दिया और आलाकमान को अपना संदेश तक दे दिया। कोई विधायक मीडिया के सामने नहीं आया और न ही कोई बयानबाजी नहीं हुई। सबने तय एजेंडा पर काम किया और निकल गए। वहीं दूसरी तरफ सचिन पायलट की स्थिति को समझने का प्रयास किया जाए तो जानकारों के अनुसार राजस्थान में सचिन पायलट का दर्जा सिर्फ एक बड़े नेता का है, जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए राजनीति में आए। 


सचिन पायलट 2018 के चुनाव में पीसीसी के अध्यक्ष थे। पूरा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया और बताया जा रहा था कि पायलट की आंधी है। गुर्जर समाज एक हो कर लड़ रहा है। गुर्जर समाज की 75 सीटों पर निर्णायक भूमिका में थे लेकिन इस लहर में भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। चुनाव प्रचार के दौरान भी पायलट के कई वीडियो भी सामने आए, जहां पायलट सेल्फी खींचने वाले युवाओं पर नाराज होते नजर आए। कांग्रेस ने प्रदेश में गुर्जर बहुल 15 सीट पर ही जीत हासिल की। ऐसे में पायलट ही एक मात्र गुर्जर नेता है, ये भ्रम भी टूटा क्योंकि अशोक चांदना भी चुनाव जीत कर आए। 


पहली बार पायलट को डिप्टी सीएम के पद से संतोष करना पड़ा। उसके बाद सचिन पायलट ने बगावत किया। जिसके बाद पीसीसी अध्यक्ष और डिप्टी सीएम दोनों पद उन्हें गंवाने पड़े। इस बार पायलट गुट ने उनके सीएम बनने को लेकर पहले ही चर्चा शुरू कर दी। ऐसे में गहलोत गुट ने भी विरोध शुरू कर दिया। पायलट को अपने समर्थकों और अपने व्यवहार दोनों पर मंथन करना होगा, नहीं तो उन्हें बार-बार सत्ता सुख से वंचित रहना पड़ सकता है।
 
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