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आखिर क्या हुआ जो 84 गांव खाली हो गए...
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sun, 19 Mar 2017 12:58 PM IST
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जैसलमेर का कुलधरा गांव
- फोटो : amar ujala
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जैसलमेर का कुलधरा गांव करीब 193 सालों से वीरान पड़ा है। कुलधरा गांव के हजारों लोग एक ही रात मे यहां से चले गए थे। इनके साथ ही 84 गांव के लोगों ने भी यहां से पलायन कर दिया। ये लोग जैसलमेर जिले की पालीवाल जाति से जुड़े हुए थे, जिन्होंने जाते हुए श्राप दिया कि फिर यहां कोई नहीं बस पाएगा।
कुलधरा जैसलमेर से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर है। पालीवाल समुदाय के इस इलाके में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था कुलधरा। मेहनती और अमीर पालीवाल ब्राह्मणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। ईट—पत्थर से बने कुलधरा गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था। कुलधरा के ये घर रेगिस्तान में भी ठंडक का अहसास कराते हैं। यहां गर्मियों में तापमान 45 डिग्री भले ही रहता हो, लेकिन आज भी इन वीरान मकानो में आपको शीतलता का अनुभव होगा।
गांव के तमाम घर झरोखों के जरिये आपस में जुड़े थे। जिनसे एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी। पालीवाल ब्राह्मण होते हुए भी उद्यमी समुदाय था। इन्होंने जल-प्रबंधन की ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि गहराई पर जमा हो जाता था।
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कुलधरा जैसलमेर से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर है। पालीवाल समुदाय के इस इलाके में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था कुलधरा। मेहनती और अमीर पालीवाल ब्राह्मणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। ईट—पत्थर से बने कुलधरा गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था। कुलधरा के ये घर रेगिस्तान में भी ठंडक का अहसास कराते हैं। यहां गर्मियों में तापमान 45 डिग्री भले ही रहता हो, लेकिन आज भी इन वीरान मकानो में आपको शीतलता का अनुभव होगा।
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गांव के तमाम घर झरोखों के जरिये आपस में जुड़े थे। जिनसे एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी। पालीवाल ब्राह्मण होते हुए भी उद्यमी समुदाय था। इन्होंने जल-प्रबंधन की ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि गहराई पर जमा हो जाता था।
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पालीवालों को महारावल ने यह दिया था वचन
जैसलमेर का कुलधरा गांव
- फोटो : amar ujala
मूलतः पाली जिले से संबधित यह जाति पाली से अपने निर्वासन के बाद जब इधर—उधर भटक रही थी, तभी जैसलमेर रियासत के तत्कालीन महारावल ने इनसे जैसलमेर में बसने की गुजारिश की। तत्कालीन महारावल ने यह भी वचन दिया था कि आप लोग जब तक चाहें जैसलमेर में रह सकते हैं।
राज्य आपके बसने का पूरा प्रबंध भी करेगा और आपसे इस राज्य में कोई कर या लगान नहीं ली जाएगी। पालीवाल अपनी व्यापार कला एवं कुशाग्र बुद्धि के लिये जाने जाते थे। ये लोग थार के रेगिस्तान में गेहूं जैसी गहन पानी की फसल बढ़ाने की कला में माहिर थे। वे जिप्सम व चट्टानी भूमि पर फसलों के लिये पानी बनाए रखने तथा सतह के नीचे चलने वाले पानी की पहचान कर उसे उपयोग में लेने की कला में माहिर थे।
राज्य आपके बसने का पूरा प्रबंध भी करेगा और आपसे इस राज्य में कोई कर या लगान नहीं ली जाएगी। पालीवाल अपनी व्यापार कला एवं कुशाग्र बुद्धि के लिये जाने जाते थे। ये लोग थार के रेगिस्तान में गेहूं जैसी गहन पानी की फसल बढ़ाने की कला में माहिर थे। वे जिप्सम व चट्टानी भूमि पर फसलों के लिये पानी बनाए रखने तथा सतह के नीचे चलने वाले पानी की पहचान कर उसे उपयोग में लेने की कला में माहिर थे।
इनकी संपत्ति देख दंग रह गए
जैसलमेर का कुलधरा गांव
- फोटो : amar ujala
कहा जाता है कि मूलराज सिंह ने उदयपुर महाराजा को अपने पुत्र गजसिंह के विवाह के लिए नारियल भेजा, जिसे उदयपुर महारावल ने स्वीकार कर अपनी पुत्री रूपकंपर का विवाह गजसिंह के साथ करना तय किया। उदयपुर महारावल की दो अन्य कन्याओं का विवाह किशनगढ़ और बीकानेर के राजकुमारों के साथ होना तय था। इसलिए जैसलमेर महारावल को यह संदेश मिला कि वे तुरन्त गजसिंह की बारात लेकर आएं। इसके बाद उदयपुर महारावल उदयपुर के लिये रवाना हो गये।
वहां किशनगढ़ और बीकानेर की वैभवशाली बारातों के आगे जैसलमेर की बारात फीकी नजर आ रही थी। इस पर उदयपुर दरबार के एक दरबारी ने जैसलमेर महारावल पर तंज कसा कि क्या सोच कर जैसलमेर के राजा मेवाड़ मे शादी का संबंध करने आ गए। जबकि उनकी तो मेवाड़ रियासत से कोई बराबरी नहीं है। इस पर महारावल मूलराज सिंह ने एक संदेश लिख कर उदयपुर के उस सेवक को दिया। इसमें लिखा था कि वह कुलधरा गांव जाकर जसरूपजी पालीवाल से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं ले आएं। सेवक जैसलमेर की ओर आया और कुलधरा पहुंचकर घर के बाहर पशुओं के लिये चारा काट रहे मैले—कुचेले कपड़े पहने जसरूपजी से मिला।
संदेश पढ़ते ही जसरूपजी ने कहा कि महारावल साहब ने यह नहीं लिखा कि कौनसी एक लाख स्वर्णमुद्राएं मैं तुम्हें दूं, क्योंकि उस जमाने में इरानी, तुर्रानी बादशाही व मुगली छाप की स्वर्णमुद्राएं प्रचलन में थी। जसरूप ने संदेश वाहक को अपने तहखाने में ले जाकर कहा कि जो भी तुम्हें अच्छी लगे वह एक लाख स्वर्णमुद्राएं गिन लें। संदेशवाहक ने उदयपुर जाकर बीकानेर व किशनगढ़ राजघरानों को यह बताया कि जैसलमेर के एक साधारण से किसान के घर में अगर इतनी संपत्ति है तो पूरे राज्य की संपन्नता का आकलन करना बेमानी होगा। इस तरह पालीवाल ब्राह्मणों ने न केवल जैसलमेर रियासत की शान बढ़ायी बल्कि महारावल की प्रतिष्ठा पर भी आंच नहीं आने दी।
वहां किशनगढ़ और बीकानेर की वैभवशाली बारातों के आगे जैसलमेर की बारात फीकी नजर आ रही थी। इस पर उदयपुर दरबार के एक दरबारी ने जैसलमेर महारावल पर तंज कसा कि क्या सोच कर जैसलमेर के राजा मेवाड़ मे शादी का संबंध करने आ गए। जबकि उनकी तो मेवाड़ रियासत से कोई बराबरी नहीं है। इस पर महारावल मूलराज सिंह ने एक संदेश लिख कर उदयपुर के उस सेवक को दिया। इसमें लिखा था कि वह कुलधरा गांव जाकर जसरूपजी पालीवाल से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं ले आएं। सेवक जैसलमेर की ओर आया और कुलधरा पहुंचकर घर के बाहर पशुओं के लिये चारा काट रहे मैले—कुचेले कपड़े पहने जसरूपजी से मिला।
संदेश पढ़ते ही जसरूपजी ने कहा कि महारावल साहब ने यह नहीं लिखा कि कौनसी एक लाख स्वर्णमुद्राएं मैं तुम्हें दूं, क्योंकि उस जमाने में इरानी, तुर्रानी बादशाही व मुगली छाप की स्वर्णमुद्राएं प्रचलन में थी। जसरूप ने संदेश वाहक को अपने तहखाने में ले जाकर कहा कि जो भी तुम्हें अच्छी लगे वह एक लाख स्वर्णमुद्राएं गिन लें। संदेशवाहक ने उदयपुर जाकर बीकानेर व किशनगढ़ राजघरानों को यह बताया कि जैसलमेर के एक साधारण से किसान के घर में अगर इतनी संपत्ति है तो पूरे राज्य की संपन्नता का आकलन करना बेमानी होगा। इस तरह पालीवाल ब्राह्मणों ने न केवल जैसलमेर रियासत की शान बढ़ायी बल्कि महारावल की प्रतिष्ठा पर भी आंच नहीं आने दी।
और इस कारण छोड़ दिए गांव
जैसलमेर का कुलधरा गांव
- फोटो : amar ujala
दीवान सालिम सिंह मोहता महारावल मूलराज सिंह के राज्य काल का सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में एक था। खाभा गांव के पालीवाल हरजल की बेटी मिरगी के रूप पर मोहित होकर इस दीवान ने उसे अपना बनाने के लिये कई प्रलोभन दिए। पालीवालों द्वारा संस्कृति विरूद्ध संबंध नहीं करने की जिद के चलते इस दीवान ने पालीवालों पर कई कर लगा दिए। जबकि महारावलों द्वारा वचन दिया गया था कि पालीवालों पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा। दीवान सालिम सिंह ने मिरगी से विवाह के लिए ब्राह्मणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि अगली पूर्णिमा तक उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा। ऐसे में पालीवाल ब्राह्मणों को गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव के पालीवाल काठोड़ी मंदिर पर इकट्ठा हुए। पालीवालों ने विक्रमी संवत् 1880 में यहां एक ही लोटे से नमक मिला पानी पीकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि भले ही छोड दें, लेकिन सालिम के अत्याचारों के आगे शीश नहीं झुकाएंगे। इसी संकल्प के साथ उन्होंने हमेशा के लिए जैसलमेर को अलविदा कह दिया।
दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि अगली पूर्णिमा तक उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा। ऐसे में पालीवाल ब्राह्मणों को गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव के पालीवाल काठोड़ी मंदिर पर इकट्ठा हुए। पालीवालों ने विक्रमी संवत् 1880 में यहां एक ही लोटे से नमक मिला पानी पीकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि भले ही छोड दें, लेकिन सालिम के अत्याचारों के आगे शीश नहीं झुकाएंगे। इसी संकल्प के साथ उन्होंने हमेशा के लिए जैसलमेर को अलविदा कह दिया।