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Youth Politics India: कॉकरोच से कांग्रेस तक; क्या छात्र आंदोलन ने बदल दिया राजनीति का एजेंडा?
Thu, 18 Jun 2026 08:37 PM IST
Sourabh Bhatt
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Thu, 18 Jun 2026 08:37 PM IST
सार
कोटा में राहुल गांधी ने छात्रों, शिक्षा सुधार, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था पर संवाद किया। राजनीतिक विश्लेषक इसे युवाओं को केंद्र में रखकर कांग्रेस की नई ‘डायलॉग पॉलिटिक्स’ रणनीति मान रहे हैं।
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कोचिंग कैपिटल कोटा में युवाओं का हूजूम
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कोचिंग से लेकर कचोरी तक के लिए प्रसिद्ध कोटा क्या अब राजनीति के नए मॉडल के लिए भी जाना जाएगा ? नीट पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ मुखर होती दिखाई और सुनाई देने लगी आवाजें क्या अब राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा तय करने जा रही हैं? क्या सोशल मीडिया से निकले छात्र आंदोलन और कॉकरोच जनता पार्टी जैसे नए प्रयोगों ने पारंपरिक राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या राहुल गांधी ने कोटा से राजनीति के एक नए मॉडल की शुरुआत कर दी है?
इन सवालों की चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि कोटा के दशहरा मैदान में आयोजित "छात्रों की गूंज" कार्यक्रम किसी सामान्य राजनीतिक सभा जैसा नहीं था। मंच पर कांग्रेस नेताओं के भाषण नहीं हुए, कार्यकर्ताओं की नारेबाजी नहीं हुई और राहुल गांधी ने भी चुनावी मुद्दों के बजाय शिक्षा, मानसिक तनाव, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था पर बात की।
आखिर बदला क्या है?
पिछले एक साल में नीट पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और छात्रों की आत्महत्याओं जैसे मुद्दों ने देशभर में युवाओं के बीच गुस्सा पैदा किया है। राहुल के भाषण से पहले कोटा के सभा स्थल पर छात्रों की बातचीत के जो अंश सोशल मीडिया पर साझा हो रहे थे उनमें निश्चित रूप से व्यवस्था के खिलाफ बच्चों की गहरी नाराजगी उभर कर सामने आ रही है। इसी दौर में कॉकरोच जनता पार्टी जैसे छात्र-केंद्रित मंच भी चर्चा में आए, जिन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य को केंद्र में रखा।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इन समूहों की चुनावी ताकत सीमित हो, लेकिन उन्होंने यह जरूर दिखाया है कि युवाओं के मुद्दे अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़क और सार्वजनिक विमर्श तक पहुंच चुके हैं।
यह भी पढें- RPSC में एक साल में क्या-क्या बदला? 47 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा, 10000 नियुक्तियां और जीरो लीकेज का दावा
राहुल ने क्या संदेश दिया?
राहुल गांधी ने कोटा में बार-बार कहा कि यह राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। लेकिन राजनीति में कई बार संदेश शब्दों से नहीं, मंच की संरचना से दिया जाता है। उन्होंने छात्रों से पूछा कि हर कोई डॉक्टर या इंजीनियर ही क्यों बनना चाहता है?
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को "रिजेक्शन सिस्टम" बताया और कहा कि लाखों बच्चों को असफल घोषित करने वाली व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए। एक छात्रा का सुसाइड नोट दिखाकर उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया। यानी राहुल ने उन मुद्दों को उठाया जो पिछले कुछ समय से छात्र आंदोलनों और युवा समूहों के एजेंडे में प्रमुखता से रहे हैं।
क्या कांग्रेस नया राजनीतिक स्पेस तलाश रही है?
2024 के बाद कांग्रेस लगातार सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और संविधान जैसे मुद्दों पर फोकस करती रही है। लेकिन कोटा का कार्यक्रम संकेत देता है कि पार्टी अब युवाओं और छात्रों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाना चाहती है।
कांग्रेस को यह भी समझ में आ रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला युवा वर्ग आज सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि एक संगठित सामाजिक और राजनीतिक शक्ति बनता जा रहा है। पेपर लीक, भर्ती में देरी और रोजगार के मुद्दे इस वर्ग को सीधे प्रभावित करते हैं।
क्या यह राजनीति का नया मॉडल है?
कोटा कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि राहुल गांधी ने भाषण कम और संवाद ज्यादा किया। उन्होंने छात्रों को मंच पर बुलाया, उनके अनुभव सुने और अभिभावकों को भी बोलने का मौका दिया। यह पारंपरिक रैली मॉडल से अलग था, जहां नेता बोलता है और जनता सुनती है।
यही वजह है कि कई राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे राहुल गांधी के "डायलॉग पॉलिटिक्स मॉडल" की शुरुआत मान रहे हैं, जिसमें बड़े राजनीतिक भाषणों की जगह किसी विशेष वर्ग की समस्याओं पर केंद्रित संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है।
आगे क्या?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोटा का यह प्रयोग कितना सफल होगा। लेकिन इतना जरूर है कि छात्र राजनीति और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दे अब केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहे। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे उभरते छात्र आंदोलनों से लेकर राहुल गांधी के कोटा संवाद तक, एक बात साफ दिखाई दे रही है-देश की राजनीति में युवाओं और शिक्षा के मुद्दे तेजी से केंद्र में आ रहे हैं।
इन सवालों की चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि कोटा के दशहरा मैदान में आयोजित "छात्रों की गूंज" कार्यक्रम किसी सामान्य राजनीतिक सभा जैसा नहीं था। मंच पर कांग्रेस नेताओं के भाषण नहीं हुए, कार्यकर्ताओं की नारेबाजी नहीं हुई और राहुल गांधी ने भी चुनावी मुद्दों के बजाय शिक्षा, मानसिक तनाव, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था पर बात की।
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आखिर बदला क्या है?
पिछले एक साल में नीट पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और छात्रों की आत्महत्याओं जैसे मुद्दों ने देशभर में युवाओं के बीच गुस्सा पैदा किया है। राहुल के भाषण से पहले कोटा के सभा स्थल पर छात्रों की बातचीत के जो अंश सोशल मीडिया पर साझा हो रहे थे उनमें निश्चित रूप से व्यवस्था के खिलाफ बच्चों की गहरी नाराजगी उभर कर सामने आ रही है। इसी दौर में कॉकरोच जनता पार्टी जैसे छात्र-केंद्रित मंच भी चर्चा में आए, जिन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य को केंद्र में रखा।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इन समूहों की चुनावी ताकत सीमित हो, लेकिन उन्होंने यह जरूर दिखाया है कि युवाओं के मुद्दे अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़क और सार्वजनिक विमर्श तक पहुंच चुके हैं।
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राहुल ने क्या संदेश दिया?
राहुल गांधी ने कोटा में बार-बार कहा कि यह राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। लेकिन राजनीति में कई बार संदेश शब्दों से नहीं, मंच की संरचना से दिया जाता है। उन्होंने छात्रों से पूछा कि हर कोई डॉक्टर या इंजीनियर ही क्यों बनना चाहता है?
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को "रिजेक्शन सिस्टम" बताया और कहा कि लाखों बच्चों को असफल घोषित करने वाली व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए। एक छात्रा का सुसाइड नोट दिखाकर उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया। यानी राहुल ने उन मुद्दों को उठाया जो पिछले कुछ समय से छात्र आंदोलनों और युवा समूहों के एजेंडे में प्रमुखता से रहे हैं।
क्या कांग्रेस नया राजनीतिक स्पेस तलाश रही है?
2024 के बाद कांग्रेस लगातार सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और संविधान जैसे मुद्दों पर फोकस करती रही है। लेकिन कोटा का कार्यक्रम संकेत देता है कि पार्टी अब युवाओं और छात्रों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाना चाहती है।
कांग्रेस को यह भी समझ में आ रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला युवा वर्ग आज सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि एक संगठित सामाजिक और राजनीतिक शक्ति बनता जा रहा है। पेपर लीक, भर्ती में देरी और रोजगार के मुद्दे इस वर्ग को सीधे प्रभावित करते हैं।
क्या यह राजनीति का नया मॉडल है?
कोटा कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि राहुल गांधी ने भाषण कम और संवाद ज्यादा किया। उन्होंने छात्रों को मंच पर बुलाया, उनके अनुभव सुने और अभिभावकों को भी बोलने का मौका दिया। यह पारंपरिक रैली मॉडल से अलग था, जहां नेता बोलता है और जनता सुनती है।
यही वजह है कि कई राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे राहुल गांधी के "डायलॉग पॉलिटिक्स मॉडल" की शुरुआत मान रहे हैं, जिसमें बड़े राजनीतिक भाषणों की जगह किसी विशेष वर्ग की समस्याओं पर केंद्रित संवाद को प्राथमिकता दी जा रही है।
आगे क्या?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोटा का यह प्रयोग कितना सफल होगा। लेकिन इतना जरूर है कि छात्र राजनीति और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दे अब केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहे। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे उभरते छात्र आंदोलनों से लेकर राहुल गांधी के कोटा संवाद तक, एक बात साफ दिखाई दे रही है-देश की राजनीति में युवाओं और शिक्षा के मुद्दे तेजी से केंद्र में आ रहे हैं।