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Ajmer: दरगाह के बाद अब ‘अढ़ाई दिन के झोपड़े’ पर मुद्दा गरमाया, नमाज पर उठी पाबंदी की मांग; जानें पूरा मामला
Sat, 30 Nov 2024 12:50 PM IST
शबाहत हुसैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
Published by: शबाहत हुसैन
Updated Sat, 30 Nov 2024 12:50 PM IST
सार
Ajmer News: अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह का मुद्दा अभी ठंडा नहीं हुआ कि एक और मुद्दे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इस बार मामला 'अढ़ाई दिन के झोंपड़े को लेकर उठा है। जहां नमाज पर पाबंदी की बात कही जा रही है। आइये जानते है पूरा मामला…
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अढ़ाई दिन का झोपड़ा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देश की सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक अढ़ाई दिन का झोपड़ा के पीछे ढेर सारे विवाद हैं। इस बार विवाद नमाज को लेकर है। दरअसल, पिछले दिनों से हिंदू और जैन संत यहां आकर जबरन नमाज़ पढ़ने का विरोध जता चुके हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के गर्भगृह और बाहर की दिवारों के खंभों पर साफ-साफ हिंदू-जैन मंदिर शैली में देखे जा सकते हैं।
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जैन साधुओं को जानें से रोका था
दरअसल, साल की शुरुआत में जब एक जैन साधु अढ़ाई दिन के झोपड़े को देखने के लिए जा रहे थे। तब उनको समुदाय विशेष के लोगों ने रोक दिया था। इसके बाद विवाद बढ़ा, क्योंकि अढ़ाई दिन का झोपड़ा एक पर्यटन स्थल है, जिसकी देखरेख की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व विभाग की है। इस घटना के बाद अजमेर सहित देश भर के जैन समुदाय ने प्रशासन के सामने अपत्ति दर्ज कराई थी।
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डिप्टी मेयर ने की जैन मंदिर को अपने स्वरूप में लौटने की मांग
अजमेर नगर निगम के डिप्टी मेयर नीरज जैन ने करते हुए कहा कि अढ़ाई दिन का झोपड़ा पहले जैन मंदिर था। यहां पर संस्कृत विद्यालय भी था। इसके प्रमाण जैन महाराज सुनील सागर जी ने वहां पर विहार के दौरान बताएं हैं। डिप्टी मेयर नीरज जैन ने कहा कि उन्होंने कई बार राज्य व केंद्र सरकार से इसका सर्वेक्षण करने व इसको अपने मौजूदा स्वरूप में लौटने की मांग की है। उन्होंने कहा कि समाज विशेष के द्वारा वहां पर की जा रही अनैतिक गतिविधियां अतिक्रमण व धार्मिक क्रियायों पर रोक लगाने की भी उन्होंने प्रशासन व सरकार से मांग की है। मैं केंद्र सरकार से और राज्य सरकार से मांग करता हूं कि उसका संरक्षण संवर्धन करके उसके प्राचीन वैभव को लौटाने का प्रयास किया जाए। अढ़ाई दिन के झोपड़े में नमाज किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वहां पर इस तरह की गतिविधियों पर रोक है, धार्मिक गतिविधि वहां नहीं की जानी चाहिए, लेकिन जानबूझकर, षड्यंत्रपूर्वक कब्जा करने की नीयत से इस प्रकार के कृत्य किसी समाज विशेष द्वारा किए जा रहे हैं, उन पर भी रोक लगनी चाहिए।
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क्या है अढ़ाई दिन का झोंपड़ा?
दरअसल 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' 1192 ईंस्वीं में अफगान सेनापति मोहम्मद गोरी के आदेश पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था। असल में इस जगह पर एक बहुत बड़ा संस्कृत विद्यालय (स्कूल) और मंदिर थे, जिन्हें तोड़कर मस्जिद में बदल दिया गया था। अढ़ाई दिन के झोपड़े के मुख्य द्वार के बायीं ओर संगमरमर का बना एक शिलालेख भी है, जिसपर संस्कृत में उस विद्यालय का जिक्र किया गया है। इस मस्जिद में कुल 70 स्तंभ हैं। असल में ये स्तंभ उन मंदिरों के हैं, जिन्हें धवस्त कर दिया गया था, लेकिन स्तंभों को वैसे ही रहने दिया गया था। इन स्तंभों की ऊंचाई करीब 25 फीट है और हर स्तंभ पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। 90 के दशक में यहां कई प्राचीन मूर्तियां ऐसे ही बिखरी पड़ी थीं, जिन्हें बाद में संरक्षित किया गया।
लंबी है इसकी कहानी
अढ़ाई दिन का झोपड़ा नाम की लंबी कहानी है। माना जाता है कि तब मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद अजमेर से गुजर रहा था। इसी दौरान उसे वास्तु के लिहाज से बेहद उम्दा हिंदू धर्मस्थल नजर आए। गोरी ने अपने सेनापति कुदुबुद्दीन ऐबक को आदेश दिया कि इनमें से सबसे सुंदर स्थल पर मस्जिद बना दी जाए. गोरी ने इसके लिए 60 घंटों यानी ढाई दिन का वक्त दिया। गोरी के दौरान हेरात के वास्तुविद अबु बकर ने इसका डिजाइन तैयार किया था। जिसपर हिंदू ही कामगारों ने 60 घंटों तक लगातार बिना रुके काम किया और मस्जिद तैयार कर दी।