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15 साल बाद भी नहीं मिला शहादत का इनाम
पठानकोट ।
Updated Sat, 26 Jul 2014 10:48 PM IST
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कारगिल युद्ध में देश के लिए शहीद हुए लांस नायक हरीशपाल को मरणोपरांत आज तक शहादत का इनाम नहीं मिला। जबकि उनके शहीद हुए 15 साल तक का समय बीत चुका है।
उपेक्षा से आहत परिजनों को इस बात का मलाल है कि गुहार के बावजूद उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। भले ही पूरा देश आपरेशन विजय की याद में शहीदों को नमन कर रहा है, लेकिन लांस नायक हरीशपाल का परिवार उपेक्षा से नाखुश है।
युद्ध की विभीषिका का दंश झेल चुके शहीद सैनिक परिवारों के जख्म आज भी हरे हैं। शहीद सैनिकों के परिवार को उपेक्षा का दंश और अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खाने की टीस उनके जख्मों को भरने नहीं दे रही। पठानकोट के गांव भरोली के रहने वाले 13 जैक रेजीमेंट के लांस नायक हरीशपाल शर्मा की माता राजदुलारी व भाई यशपाल शर्मा ने बताया कि 15 जून 1999 को कारगिल युद्ध में अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतह करने की कोशिश में हरीशपाल ने शहादत दी थी।
अदम्य साहस को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल देने की घोषणा की थी, लेकिन दुखद है कि 15 वर्ष बाद भी अभी तक उनके मेडल नहीं मिला। शहीद के परिजनों ने सजल आंखों से कहा कि वह कई बार सेना को पत्र लिख चुके हैं, लेकिन उन्हें हर बार निराशा हाथ लगी है।
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उन्होंने बताया कि बेटे के शहीद होने के डेढ़ वर्ष बाद ही उसकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली थी। सरकार की ओर से दी गई आर्थिक सहायता भी वह अपने साथ ले गई। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार की ओर से उन्हें केवल दो लाख रुपये ही उन्हें मिले, जिसका उन्होंने अपने बेटे की याद में गांव में मंदिर बनवा दिया। शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्य समय-समय पर आकर उनका दुख बांटने का प्रयास करते आए हैं।
15 वर्ष गुजर जाने के बाद भी गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके बेटे के नाम पर नहीं हो सका। पंचायत द्वारा गांव के बाहर बनाए यादगारी गेट की हालत भी खस्ता हो चुकी है। शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव रविंद्र सिंह ने कहा कि सरकार द्वारा घोषित सेना मैडल आज तक परिवार को न मिलना शहीद की शहादत का अपमान है।
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उपेक्षा से आहत परिजनों को इस बात का मलाल है कि गुहार के बावजूद उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। भले ही पूरा देश आपरेशन विजय की याद में शहीदों को नमन कर रहा है, लेकिन लांस नायक हरीशपाल का परिवार उपेक्षा से नाखुश है।
युद्ध की विभीषिका का दंश झेल चुके शहीद सैनिक परिवारों के जख्म आज भी हरे हैं। शहीद सैनिकों के परिवार को उपेक्षा का दंश और अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खाने की टीस उनके जख्मों को भरने नहीं दे रही। पठानकोट के गांव भरोली के रहने वाले 13 जैक रेजीमेंट के लांस नायक हरीशपाल शर्मा की माता राजदुलारी व भाई यशपाल शर्मा ने बताया कि 15 जून 1999 को कारगिल युद्ध में अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतह करने की कोशिश में हरीशपाल ने शहादत दी थी।
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अदम्य साहस को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल देने की घोषणा की थी, लेकिन दुखद है कि 15 वर्ष बाद भी अभी तक उनके मेडल नहीं मिला। शहीद के परिजनों ने सजल आंखों से कहा कि वह कई बार सेना को पत्र लिख चुके हैं, लेकिन उन्हें हर बार निराशा हाथ लगी है।
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उन्होंने बताया कि बेटे के शहीद होने के डेढ़ वर्ष बाद ही उसकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली थी। सरकार की ओर से दी गई आर्थिक सहायता भी वह अपने साथ ले गई। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार की ओर से उन्हें केवल दो लाख रुपये ही उन्हें मिले, जिसका उन्होंने अपने बेटे की याद में गांव में मंदिर बनवा दिया। शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्य समय-समय पर आकर उनका दुख बांटने का प्रयास करते आए हैं।
15 वर्ष गुजर जाने के बाद भी गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके बेटे के नाम पर नहीं हो सका। पंचायत द्वारा गांव के बाहर बनाए यादगारी गेट की हालत भी खस्ता हो चुकी है। शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव रविंद्र सिंह ने कहा कि सरकार द्वारा घोषित सेना मैडल आज तक परिवार को न मिलना शहीद की शहादत का अपमान है।