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ईएसआई का सच : 10 साल प्रीमियम जमा करने के बावजूद ऑपरेशन के लिए नहीं मिले 40 हजार
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मोहाली। दस साल तक मेरे वेतन से ईएसआई का पैसा कटता रहा, लेकिन आज जब मुझे इलाज की जरूरत है, तो मुझे अस्पताल के चक्कर लगवाकर और 40 हजार रुपये मांगकर बाहर निकाल दिया गया। यह कहना है बलौंगी निवासी 44 वर्षीय निनकू का। वह इन दिनों ईएसआई स्वास्थ्य योजना की कार्यप्रणाली से आहत होकर बीमारी से तड़प रहा है। वह एक फैक्टरी में ऑपरेटर है। लगभग एक महीने पहले उन्हें फिस्टुला इन एनो (भगंदर) की समस्या हुई। 28 अगस्त को उन्हें ईएसआई अस्पताल ले जाया गया, जहां से उन्हें सिविल अस्पताल फेज-6 भेज दिया गया। सिविल अस्पताल में कुछ दिन इलाज चला और डॉक्टरों ने सर्जरी की। घाव में पस पड़ने की वजह से उनको इंडस अस्पताल भेजा गया।
सर्जरी के बाद शुरू हुआ दर्द का नया दौर
निनकू की पत्नी संगीता बताती हैं कि जब पट्टियां खोली गईं तो पता चला कि अंदर ही अंदर पस जमा हो गया है। पस तेजी से बह रहा था। डॉक्टर ने कहा कि जख्म सूख जाएगा, लेकिन पस आना बंद ही नहीं हुआ। हर समय कपड़े खराब होते हैं, बदबू आती है और दर्द बना रहता है। इसके बाद उन्हें इंडस अस्पताल रेफर कर दिया गया। वहां आठ दिन इलाज चला। संगीता बताती हैं कि अस्पताल वालों ने कहा कि दोबारा ऑपरेशन जरूरी है। इसके लिए उन्होंने 40 हजार रुपये मांगे या फिर ईएसआई की लिखित मंजूरी। दो दिन तक ईएसआई दफ्तर के चक्कर लगाते रहे, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। आखिरकार 27 सितंबर को निनकू को बिना ऑपरेशन के ही डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह घर पर हैं और उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है।
मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने उठाए सवाल
मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के श्रम कानून समिति के चेयरमैन जसबीर सिंह ने इस मामले पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि मोहाली की इंडस्ट्रीज हर महीने ईएसआई को लगभग 10 करोड़ रुपये का योगदान देती हैं, लेकिन जब कर्मचारियों को जरूरत पड़ती है, तो उन्हें ऐसी घटिया सुविधाएं मिलती हैं। निनकू का मामला सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। हम उन्हें तुरंत उचित इलाज दिलवाने के लिए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
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निनकू का परिवार अब न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। उनकी पत्नी का सवाल है कि अगर ईएसआई से इलाज नहीं मिलेगा, तो इतना पैसा काटने का क्या मतलब है? क्या गरीब मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ जायज है? यह मामला सवाल उठाता है कि क्या ईएसआई योजना वास्तव में कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षा कवच है या फिर केवल कागजी दिखावा?
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सर्जरी के बाद शुरू हुआ दर्द का नया दौर
निनकू की पत्नी संगीता बताती हैं कि जब पट्टियां खोली गईं तो पता चला कि अंदर ही अंदर पस जमा हो गया है। पस तेजी से बह रहा था। डॉक्टर ने कहा कि जख्म सूख जाएगा, लेकिन पस आना बंद ही नहीं हुआ। हर समय कपड़े खराब होते हैं, बदबू आती है और दर्द बना रहता है। इसके बाद उन्हें इंडस अस्पताल रेफर कर दिया गया। वहां आठ दिन इलाज चला। संगीता बताती हैं कि अस्पताल वालों ने कहा कि दोबारा ऑपरेशन जरूरी है। इसके लिए उन्होंने 40 हजार रुपये मांगे या फिर ईएसआई की लिखित मंजूरी। दो दिन तक ईएसआई दफ्तर के चक्कर लगाते रहे, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। आखिरकार 27 सितंबर को निनकू को बिना ऑपरेशन के ही डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह घर पर हैं और उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है।
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मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने उठाए सवाल
मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के श्रम कानून समिति के चेयरमैन जसबीर सिंह ने इस मामले पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि मोहाली की इंडस्ट्रीज हर महीने ईएसआई को लगभग 10 करोड़ रुपये का योगदान देती हैं, लेकिन जब कर्मचारियों को जरूरत पड़ती है, तो उन्हें ऐसी घटिया सुविधाएं मिलती हैं। निनकू का मामला सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। हम उन्हें तुरंत उचित इलाज दिलवाने के लिए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
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निनकू का परिवार अब न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। उनकी पत्नी का सवाल है कि अगर ईएसआई से इलाज नहीं मिलेगा, तो इतना पैसा काटने का क्या मतलब है? क्या गरीब मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ जायज है? यह मामला सवाल उठाता है कि क्या ईएसआई योजना वास्तव में कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षा कवच है या फिर केवल कागजी दिखावा?