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सब्सिडी नहीं, क्वालिटी इनपुट चाहिए
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 18 Feb 2014 01:37 AM IST
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किसानों को सब्सिडी नहीं चाहिए। उन्हें क्वालिटी इनपुट चाहिए, जिसमें बिजली, पानी, बीज, खाद, कीटनाशक आदि शामिल है। वहीं, खेती पर ब्याज की दर पांच फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। तभी किसान और किसानी को बचाया जा सकता है।
ये विचार इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च काउंसिल के डायरेक्टर जनरल डॉ. एस अयप्पन ने कृषि विशेषज्ञों के विचारों और किसानों के सवालों के बाद व्यक्त किए। वह चप्पड़चिड़ी में शुरू हुए प्रोग्रेसिव पंजाब एग्रीकल्चर समिट के पहले तकनीकी सेशन के समापन पर बोल रहे थे। सेशन के दौरान पंजाब में खेतीबाड़ी की चुनौतियों और भविष्य की राह पर मंथन किया गया।
दौरान लागत घटाने और भूमि व जल संरक्षण पर फोकस रहा। डॉ. अयप्पन ने कहा कि खेती में पंजाब देश की अगुवाई कर रहा है। फूड सिक्योरिटी बिल लागू होने के बाद देश एक बार फिर पंजाब की तरफ देख रहा है। इसके लिए पंजाब को अपनी मिट्टी और पानी की देखरेख करते हुए फसलों का विकेंद्रीयकरण लागू करना चाहिए। उन्होंने किसानों से कहा कि वे खेती को एक मामूली व्यवसाय न समझें, एग्रो बिजनेस प्रिंसिपल अपनाएं।
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डॉ. अयप्पन ने लागत कम करके आमदनी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से कहा कि वे पानी का बजट बनाएं ताकि पानी बचाया जा सके। पंजाब में खेती की चुनौतियों का सामना करने के लिए फसल विकेंद्रीयकरण, जल-भूमि संरक्षण, प्रोसेसिंग से मुनाफा बढ़ाना जरूरी है।
पीएयू के वीसी डॉ. बीएस ढिल्लों ने कहा कि हरित क्रांति पर चलकर पंजाब आज कई चुनौतियां झेल रहा है। पंजाब का एग्रीकल्चर मॉडल अपनाने वाले भी भविष्य में इसे झेलेंगे। एचएयू के पूर्व वीसी डॉ. जेएस कटियाल ने जमीन की संभाल और पानी की बचत पर विचार रखे। जैन इरिगेशन के एसपी यादव ने ड्रिप इरिगेशन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि पंजाब में खेती के सतत विकास के लिए संगठित सिंचाई प्रणाली अपनाने की जरूरत है। सिमाईट के डॉ. एमएल जाट ने फसलों के साथ खेती तकनीक में तब्दीली को अपनाने की बात रखी। उन्होंने कहा कि नई मशीनें किसानों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती हैं। इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के डॉ. पीके अग्रवाल ने मौसम में बदलाव के खेती पर प्रभाव के बारे में बताया।
न्यू हॉलैंड के बरजिंदर सिंह ने खेती के मशीनीकरण के फायदे बताए। गडवासू के वीसी डॉ. वीके तनेजा ने फसल विकेंद्रीयकरण में पशुधन की अहमियत बताई। सेशन को दो प्रगतिशील किसान विक्रम आहूजा और मोहिंदर सिंह दोसांझ ने भी संबोधित किया। आखिर में किसानों के सवालों के जवाब दिए गए। सबसे पहले एफसीडी सुरेश कुमार ने सभी का स्वागत किया।
भूजल स्तर गिरने से बढ़ी बिजली की खपत
चप्पड़चिड़ी। एचएयू के पूर्व वीसी डॉ. जेसी कटियाल ने कहा कि पंजाब में भूजल स्तर गिरने से बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है। वर्ष-1990 से 2008 के बीच यह खपत 40 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ी है। वह एग्रीकल्चर समिट के पहले सेशन में मिट्टी और पानी की स्थिति पर विचार रख रहे थे।
डॉ. कटियाल ने कहा कि खाद के गलत इस्तेमाल से जमीन की शक्ति प्रभावित हुई। मिट्टी में 17 न्यूट्रीएंट्स में से एक की भी कमी हो जाए तो उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। पंजाब की मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉसफोरस, सल्फर की कमी हो गई। वहीं, पंजाब में नहरी सिंचाई लगातार कम होती गई, ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ती गई।
किसानों की मदद को नीतियां रिव्यू करे केंद्र - बादल
चप्पड़चिड़ी। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने फिर दोहराया कि रेलवे की तरह खेती का भी अलग बजट होना चाहिए। तभी खेती के मसलों का समाधान हो सकता है। चप्पड़चिड़ी में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बादल ने कहा कि खेती ने ही देश को संभाला है, यही देश की आर्थिकता है।
छोटे किसानों की मदद के लिए नीतियां रिव्यू की जानी चाहिए। केंद्र सरकार को खेतीबाड़ी को टॉप प्रायॉरिटी देनी चाहिए। पंजाब में फूड प्रोसेसिंग यूनिट के सवाल पर उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही कुछ यूनिट लगेंगी। बादल ने बताया कि इन्वेस्टमेंट समिट में जितने एमओयू साइन हुए थे, उनमें से आधे फूड प्रोसेसिंग यूनिट के संबंध में थे। जिनके जल्द शुरू होने की उम्मीद है।
सीएम ने दी आलू खोज केंद्र को हरी झंडी
चप्पड़चिड़ी। पंजाब में आलू बीज के विकास और खोज के लिए सेंटर फॉर एक्सीलेंस स्थापित किया जाएगा। यह पंजाब सरकार, नीदरलैंड यूनिवर्सिटी और पॉसकॉन कनफेडरेशन ऑफ पोटैटो सीड फॉमर्स द्वारा सांझे तौर पर स्थापित किया जाएगा।
सोमवार शाम मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इस पर सैद्धांतिक सहमति जता दी। सीएम ने तकनीकी सेशन और विदेशी डेलिगेट्स से मुलाकात के बाद यह फैसला लिया। बादल ने नीदरलैंड के डेलिगेट्स और पंजाब के किसानों को भरोसा दिया कि यह सेंटर मील का पत्थर साबित होगा। जल्द ही इस संबंध में एमओयू साइन किया जाएगा।
किसानी बचाने के लिए मार्गदर्शन करें विशेषज्ञ
चप्पड़चिड़ी। सीएम प्रकाश सिंह बादल ने वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, कृषि विशेषज्ञों से आह्वान किया है कि वे किसानों व किसानी को बचाने के लिए पंजाब सरकार का मार्गदर्शन करें।
खेती से संबंधित गलत नीतियों को सुधारने में अहम रोल अदा करें। सीएम सोमवार शाम को चप्पड़चिड़ी में 51 माहिरों को सम्मानित करने के बाद लोगों को संबोधित कर रहे थे।
सीएम ने कहा कि वेटरन साइंटिस्ट आगे आकर केंद्र व राज्य सरकारों की मदद करें। ताकि इस ट्रेंड को बदलकर किसानों को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य को ऐसी खेती आर्थिकता से निकालने की जरूरत है, जहां खेती पर खर्च ज्यादा है और लाभ कम। इसी के चलते पिछले दस सालों में एक लाख किसानों ने खेती छोड़ दी।
अगर यह ट्रेंड न बदला तो देश में कानून-व्यवस्था की समस्या बन सकती है, अराजकता फैल सकती है। यह स्थिति तभी बदली जा सकती है जब वे विशेषज्ञ योगदान दें, जिन्होंने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाया। वे पंजाब सरकार को सुझाव देकर खेती के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं। यहां विशेषज्ञों का सम्मान करने का मकसद उनके प्रति सम्मान दर्शाना है। बादल ने एफसीडी सुरेश कुमार और उनकी टीम को भी समिट की सफलता के लिए बधाई दी। सुरेश कुमार ने कहा कि बीस हजार किसान अब तक प्रदर्शनी का दौरा कर चुके हैं।
गैरमौजूदगी में भी मिला सम्मान
सीएम प्रकाश सिंह बादल ने चप्पड़चिड़ी में डॉ. जीएस खुश, डॉ. डीआर भूंबला, डॉ. जीएस कालकट, डॉ. दीपक पेंटल, डॉ. गुरबचन सिंह सहित कई विशेषज्ञों को सम्मानित किया। वहीं, कुछ साइंटिस्ट समागम में पहुंच नहीं सके, उन्हें गैर मौजूदगी में सम्मानित किया गया।
इनमें डॉ. एमएस स्वामीनाथन, डॉ. जेएस कंवर, डॉ. वीएल चोपड़ा, डॉ. एस अयप्पन, डॉ. आरएम आचार्या सहित कई अन्य शामिल थे।
फसलें ऐसी हों, जो कीड़ों से निपट सकें
सीआईएमएमवाईटी के डायरेक्टर डॉ. थॉमस लंपकिन और आईएआरआई के ज्वॉइंट डायरेक्टर केवी प्रभु ने बायो टेक्नोलॉजी के माहिरों से फसलों की नई प्रजातियां विकसित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि ऐसी फसलें विकसित करें, जो कीड़ों और बीमारियों का सामना कर सकें। इनमें पानी की खपत और खाद की जरूरत कम हो। वे सूखे का भी मुकाबला कर सकें, ताकि बढ़ती जरूरत का सामना किया जा सके।
उन्होंने कहा कि अनाज उत्पादन 1975 में 15 मिलियन टन था, जो बढ़ कर 257 मिलियन टन पहुंच गया है। इसके बाद भी न तो गरीबी में कमी आई, न किसानों को अच्छे दाम मिले। देश के पास दुनिया की 17 फीसदी आबादी और 11 फीसदी पशुधन है। दुनिया का 4.2 प्रतिशत पानी, 2.4 प्रतिशत खेती रकबा है, जिसमें से 40 फीसदी सिंचाई योग्य है।
देश में प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता 1951 से लेकर अब तक 400-470 ग्राम ही रही है। दालों की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 50 ग्राम से भी कम है। नई चुनौतियों में अनाज की मांग की आपूर्ति, उत्पादन में बढ़ोतरी, पौष्टिक तत्व यकीनी बनाना, जमीन की सेहत में सुधार पानी का स्तर बचाना, फसल को कीड़ों-बीमारियों से बचाना और वातावरण में तब्दीली शामिल हैं।
अनाज उत्पादन को 2023 तक 285 मिलियन टन करना जरूरी हो गया है, वरना अनाज सुरक्षा खत्म हो जाएगी। डीयू के सेंटर फॉर जेनेटेकि मॉडिफिकेशन ने प्रजेंटेशन दिया। प्रगतिशील किसानों गुरप्रीत सेखों और वीएस सिद्धू ने भी विचार रखे।
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ये विचार इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च काउंसिल के डायरेक्टर जनरल डॉ. एस अयप्पन ने कृषि विशेषज्ञों के विचारों और किसानों के सवालों के बाद व्यक्त किए। वह चप्पड़चिड़ी में शुरू हुए प्रोग्रेसिव पंजाब एग्रीकल्चर समिट के पहले तकनीकी सेशन के समापन पर बोल रहे थे। सेशन के दौरान पंजाब में खेतीबाड़ी की चुनौतियों और भविष्य की राह पर मंथन किया गया।
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दौरान लागत घटाने और भूमि व जल संरक्षण पर फोकस रहा। डॉ. अयप्पन ने कहा कि खेती में पंजाब देश की अगुवाई कर रहा है। फूड सिक्योरिटी बिल लागू होने के बाद देश एक बार फिर पंजाब की तरफ देख रहा है। इसके लिए पंजाब को अपनी मिट्टी और पानी की देखरेख करते हुए फसलों का विकेंद्रीयकरण लागू करना चाहिए। उन्होंने किसानों से कहा कि वे खेती को एक मामूली व्यवसाय न समझें, एग्रो बिजनेस प्रिंसिपल अपनाएं।
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डॉ. अयप्पन ने लागत कम करके आमदनी बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से कहा कि वे पानी का बजट बनाएं ताकि पानी बचाया जा सके। पंजाब में खेती की चुनौतियों का सामना करने के लिए फसल विकेंद्रीयकरण, जल-भूमि संरक्षण, प्रोसेसिंग से मुनाफा बढ़ाना जरूरी है।
पीएयू के वीसी डॉ. बीएस ढिल्लों ने कहा कि हरित क्रांति पर चलकर पंजाब आज कई चुनौतियां झेल रहा है। पंजाब का एग्रीकल्चर मॉडल अपनाने वाले भी भविष्य में इसे झेलेंगे। एचएयू के पूर्व वीसी डॉ. जेएस कटियाल ने जमीन की संभाल और पानी की बचत पर विचार रखे। जैन इरिगेशन के एसपी यादव ने ड्रिप इरिगेशन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि पंजाब में खेती के सतत विकास के लिए संगठित सिंचाई प्रणाली अपनाने की जरूरत है। सिमाईट के डॉ. एमएल जाट ने फसलों के साथ खेती तकनीक में तब्दीली को अपनाने की बात रखी। उन्होंने कहा कि नई मशीनें किसानों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती हैं। इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के डॉ. पीके अग्रवाल ने मौसम में बदलाव के खेती पर प्रभाव के बारे में बताया।
न्यू हॉलैंड के बरजिंदर सिंह ने खेती के मशीनीकरण के फायदे बताए। गडवासू के वीसी डॉ. वीके तनेजा ने फसल विकेंद्रीयकरण में पशुधन की अहमियत बताई। सेशन को दो प्रगतिशील किसान विक्रम आहूजा और मोहिंदर सिंह दोसांझ ने भी संबोधित किया। आखिर में किसानों के सवालों के जवाब दिए गए। सबसे पहले एफसीडी सुरेश कुमार ने सभी का स्वागत किया।
भूजल स्तर गिरने से बढ़ी बिजली की खपत
चप्पड़चिड़ी। एचएयू के पूर्व वीसी डॉ. जेसी कटियाल ने कहा कि पंजाब में भूजल स्तर गिरने से बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है। वर्ष-1990 से 2008 के बीच यह खपत 40 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ी है। वह एग्रीकल्चर समिट के पहले सेशन में मिट्टी और पानी की स्थिति पर विचार रख रहे थे।
डॉ. कटियाल ने कहा कि खाद के गलत इस्तेमाल से जमीन की शक्ति प्रभावित हुई। मिट्टी में 17 न्यूट्रीएंट्स में से एक की भी कमी हो जाए तो उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। पंजाब की मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉसफोरस, सल्फर की कमी हो गई। वहीं, पंजाब में नहरी सिंचाई लगातार कम होती गई, ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ती गई।
किसानों की मदद को नीतियां रिव्यू करे केंद्र - बादल
चप्पड़चिड़ी। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने फिर दोहराया कि रेलवे की तरह खेती का भी अलग बजट होना चाहिए। तभी खेती के मसलों का समाधान हो सकता है। चप्पड़चिड़ी में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बादल ने कहा कि खेती ने ही देश को संभाला है, यही देश की आर्थिकता है।
छोटे किसानों की मदद के लिए नीतियां रिव्यू की जानी चाहिए। केंद्र सरकार को खेतीबाड़ी को टॉप प्रायॉरिटी देनी चाहिए। पंजाब में फूड प्रोसेसिंग यूनिट के सवाल पर उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही कुछ यूनिट लगेंगी। बादल ने बताया कि इन्वेस्टमेंट समिट में जितने एमओयू साइन हुए थे, उनमें से आधे फूड प्रोसेसिंग यूनिट के संबंध में थे। जिनके जल्द शुरू होने की उम्मीद है।
सीएम ने दी आलू खोज केंद्र को हरी झंडी
चप्पड़चिड़ी। पंजाब में आलू बीज के विकास और खोज के लिए सेंटर फॉर एक्सीलेंस स्थापित किया जाएगा। यह पंजाब सरकार, नीदरलैंड यूनिवर्सिटी और पॉसकॉन कनफेडरेशन ऑफ पोटैटो सीड फॉमर्स द्वारा सांझे तौर पर स्थापित किया जाएगा।
सोमवार शाम मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इस पर सैद्धांतिक सहमति जता दी। सीएम ने तकनीकी सेशन और विदेशी डेलिगेट्स से मुलाकात के बाद यह फैसला लिया। बादल ने नीदरलैंड के डेलिगेट्स और पंजाब के किसानों को भरोसा दिया कि यह सेंटर मील का पत्थर साबित होगा। जल्द ही इस संबंध में एमओयू साइन किया जाएगा।
किसानी बचाने के लिए मार्गदर्शन करें विशेषज्ञ
चप्पड़चिड़ी। सीएम प्रकाश सिंह बादल ने वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, कृषि विशेषज्ञों से आह्वान किया है कि वे किसानों व किसानी को बचाने के लिए पंजाब सरकार का मार्गदर्शन करें।
खेती से संबंधित गलत नीतियों को सुधारने में अहम रोल अदा करें। सीएम सोमवार शाम को चप्पड़चिड़ी में 51 माहिरों को सम्मानित करने के बाद लोगों को संबोधित कर रहे थे।
सीएम ने कहा कि वेटरन साइंटिस्ट आगे आकर केंद्र व राज्य सरकारों की मदद करें। ताकि इस ट्रेंड को बदलकर किसानों को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि राज्य को ऐसी खेती आर्थिकता से निकालने की जरूरत है, जहां खेती पर खर्च ज्यादा है और लाभ कम। इसी के चलते पिछले दस सालों में एक लाख किसानों ने खेती छोड़ दी।
अगर यह ट्रेंड न बदला तो देश में कानून-व्यवस्था की समस्या बन सकती है, अराजकता फैल सकती है। यह स्थिति तभी बदली जा सकती है जब वे विशेषज्ञ योगदान दें, जिन्होंने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाया। वे पंजाब सरकार को सुझाव देकर खेती के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं। यहां विशेषज्ञों का सम्मान करने का मकसद उनके प्रति सम्मान दर्शाना है। बादल ने एफसीडी सुरेश कुमार और उनकी टीम को भी समिट की सफलता के लिए बधाई दी। सुरेश कुमार ने कहा कि बीस हजार किसान अब तक प्रदर्शनी का दौरा कर चुके हैं।
गैरमौजूदगी में भी मिला सम्मान
सीएम प्रकाश सिंह बादल ने चप्पड़चिड़ी में डॉ. जीएस खुश, डॉ. डीआर भूंबला, डॉ. जीएस कालकट, डॉ. दीपक पेंटल, डॉ. गुरबचन सिंह सहित कई विशेषज्ञों को सम्मानित किया। वहीं, कुछ साइंटिस्ट समागम में पहुंच नहीं सके, उन्हें गैर मौजूदगी में सम्मानित किया गया।
इनमें डॉ. एमएस स्वामीनाथन, डॉ. जेएस कंवर, डॉ. वीएल चोपड़ा, डॉ. एस अयप्पन, डॉ. आरएम आचार्या सहित कई अन्य शामिल थे।
फसलें ऐसी हों, जो कीड़ों से निपट सकें
सीआईएमएमवाईटी के डायरेक्टर डॉ. थॉमस लंपकिन और आईएआरआई के ज्वॉइंट डायरेक्टर केवी प्रभु ने बायो टेक्नोलॉजी के माहिरों से फसलों की नई प्रजातियां विकसित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि ऐसी फसलें विकसित करें, जो कीड़ों और बीमारियों का सामना कर सकें। इनमें पानी की खपत और खाद की जरूरत कम हो। वे सूखे का भी मुकाबला कर सकें, ताकि बढ़ती जरूरत का सामना किया जा सके।
उन्होंने कहा कि अनाज उत्पादन 1975 में 15 मिलियन टन था, जो बढ़ कर 257 मिलियन टन पहुंच गया है। इसके बाद भी न तो गरीबी में कमी आई, न किसानों को अच्छे दाम मिले। देश के पास दुनिया की 17 फीसदी आबादी और 11 फीसदी पशुधन है। दुनिया का 4.2 प्रतिशत पानी, 2.4 प्रतिशत खेती रकबा है, जिसमें से 40 फीसदी सिंचाई योग्य है।
देश में प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता 1951 से लेकर अब तक 400-470 ग्राम ही रही है। दालों की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 50 ग्राम से भी कम है। नई चुनौतियों में अनाज की मांग की आपूर्ति, उत्पादन में बढ़ोतरी, पौष्टिक तत्व यकीनी बनाना, जमीन की सेहत में सुधार पानी का स्तर बचाना, फसल को कीड़ों-बीमारियों से बचाना और वातावरण में तब्दीली शामिल हैं।
अनाज उत्पादन को 2023 तक 285 मिलियन टन करना जरूरी हो गया है, वरना अनाज सुरक्षा खत्म हो जाएगी। डीयू के सेंटर फॉर जेनेटेकि मॉडिफिकेशन ने प्रजेंटेशन दिया। प्रगतिशील किसानों गुरप्रीत सेखों और वीएस सिद्धू ने भी विचार रखे।