शुक्रवार से नवरात्र शुरू हो रहे हैं। आपको बताते हैं देवभूमि उत्तराखंड के कुछ ऐसे देवी मंदिरों के बारे में जिनके दर्शन करने मात्र से सारे कष्ठ दूर हो जाते हैं। चंद्रबदनी मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, लेकिन श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। यह मंदिर समुद्र तल से 2,277 मीटर पर स्थित है। चंद्रबनी मंदिर देवप्रयाग से हिंडोलाखाल मोटर मार्ग पर लगभग 22 किमी और नरेंद्रनगर से 109 किमी. दूर है। नई टिहरी-टिपरी मोटर मार्ग से भी चंद्रबदनी पहुंचा जा सकता है। नैखरी में सड़क से पांच-छह सौ मीटर पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
नवरात्र पर इन सिद्धपीठों के दर्शन करने से पूरी होगी हर मुराद
सुरकुट पर्वत पर स्थित मां सुरकंडा मंदिर में सती का सिर गिरा था, जिससे वहां सिर की पूजा की जाती है। नवरात्र पर यहां भव्य मेला आयोजित किया जाता है। जहां सैकड़ों लोग मन्नतें मांगने पहुंचते हैं। सुरकंडा मंदिर चंबा-मसूरी मोटर मार्ग पर समुद्र तल से 2757 मीटर पर स्थित है। सुरकंडा मंदिर ऋषिकेश से चंबा 60 किमी और वहां से मसूरी मार्ग पर 20 किमी सड़क की दूरी तय कर कद्दूखाल स्थित है। कद्दूखाल से दो किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है।
नवरात्र पर इन सिद्धपीठों के दर्शन करने से पूरी होगी हर मुराद
कुंजापुरी मंदिर में कुंज की पूजा की जाती है। मंदिर के गर्भ गृह में प्रतिमा नहीं हैं वहां एक गड्ढानुमा स्थल है। बताते हैं कि यह वही स्थान है जहां सती का कुंज (पैर) गिरा था। यहीं पर पूजा की जाती है, जबकि देवी की एक छोटी सी प्रतिमा एक कोने में रखी है। नरेंद्रनगर ब्लॉक में ऋषिकेश से 28 किमी दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है।
नवरात्र पर इन सिद्धपीठों के दर्शन करने से पूरी होगी हर मुराद
श्रीनगर गढ़वाल से 15 किमी. की दूर पर स्थित कलियासौड़ में मां धारी देवी मंदिर स्थित है। लोक मान्यताओं के अनुसार धारी देवी में स्थित काली माता की मूर्ति मूल रूप से कालीमठ में थी जो बाढ़ में बहकर यहां कलियासौड़ नामक स्थान पर रुक गई। मान्यता के अनुसार कुंजू नामक एक धुनार को स्वप्न में अपने को नदी से बाहर निकालने का आदेश दिया। माना जाता है कि काली का कमर से ऊपर का हिस्सा धारी व कमर से नीचे का हिस्सा कालीमठ में है।
नवरात्र पर इन सिद्धपीठों के दर्शन करने से पूरी होगी हर मुराद
गढ़वाल के श्रीनगर स्थित कंसमर्दनी मंदिर का निर्माण शंकराचार्य के आदेश पर किया गया था। पुराणों के अनुसार जब कंस ने महामाया को शिला पर पटका था तो वह इस स्थान पर स्थापित हो गई। यहां देवी को कंस के अहम को नाश करने वाली कंसमर्दनी के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रों के दौरान यहां कन्याओं की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।