ज्योतिष के अनुसार सूर्य ही एक ऐसा ग्रह है जो कभी वक्री नहीं होता है। ये सदैव मार्गी रहता है। सूर्य प्रत्येक माह एक राशि से दूसरी राशि में प्रेवश करता है। सूर्य के राशि परिवर्तन की तिथि के संक्रांति कहा जाता है। इस तरह से एक वर्ष में 12 संक्रांति तिथियां आती हैं। सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है, उसी के अनुसार संक्रांति तिथि का नाम होता है। जिस तरह से सूर्य के मकर में प्रवेश करने की तिथि के मकर संक्रांति मनाई जाती हैं, उसी तरह से सूर्य के मिथुन में प्रवेश करने की तिथि को मिथुन संक्रांति कहा जाता है। हिंदी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह वर्ष का तीसरा माह होता है। इस माह में सूर्यदेव मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं। इस बार सूर्य देव 15 जून 2021 दिन मंगलवार को मिथुन में प्रवेश करने जा रहे हैं। संक्रांति तिथि पर दान-पुण्य और सूर्य पूजा का विशेष महत्व माना गया है। जानते हैं संक्रांति तिथि का महत्व, पूजा विधि और समय।
Mithun sankranti 2021: इस दिन है मिथुन संक्रांति, जानिए महत्व, तिथि, शुभ मुहूर्त और सूर्यदेव की पूजन विधि
15 जून 2021, मंगलवार को सूर्य मिथुन राशि में प्रेवश करने जा रहे हैं। इस दिन को मिथुन संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। संक्रांति तिथि को दान-पुण्य और सूर्य की आराधना करने से मान-प्रतिष्ठा और उच्च पद की प्राप्ति होती है।
सूर्य का मिथुन में प्रवेश समय-
हिंदू पंचांग के अनुसार जिस दिन सूर्य मिथुन में प्रेवश करेंगें उस दिन ज्येष्ठ मास की पंचमी तिथि है। 15 जून 2021 दिन मंगलवार के सूर्य प्रातः 06 बजकर 17 मिनट पर मिथुन राशि में गोचर करेंगे।
मिथुन संक्रांति पुण्य काल- सुबह 06 बजकर 17 मिनट से दोपहर 01 बजकर 43 मिनट तक
पुण्य काल कुल अवधि- 07 घंटे 27 मिनट
मिथुन संक्रांति महापुण्य काल- सुबह 06 बजकर 17 मिनट से सुबह 08 बजकर 36 मिनट तक
महापुण्य काल कुल अवधि- 02 घंटे 20 मिनट
मिथुन संक्रांति क्षण- सुबह 06 बजकर 17 मिनट पर
मिथुन संक्रांति महत्व-
हिंदू धर्म में संक्रांति तिथि का खास महत्व माना जाता है। लोग इस दिन को पर्व की तरह मनाते हैं। यह पर्व प्रकृति में परिवर्तन का संकेत माना जाता है। इसी दिन से वर्षा ऋतु की शुरुआत मानी जाती है। मिथुन संक्रांति को रज पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन दान-स्नान और सूर्य पूजा का बहुत महत्व माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन लोग पवित्र नदी, जलकुंड में स्नान करते हैं और दान-पुण्य करते हैं। इससे सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है। कई जगहों पर लोग सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए इस दिन व्रत भी करते हैं। मान्यता अनुसार सूर्य देव की कृपा से मान-प्रतिष्ठा और उच्चपद की प्राप्ति होती है।
मिथुन संक्रांति पर की जाती है सिलबट्टे की पूजा
मिथुन संक्रांति के पावन पर्व पर सिलबट्टे की पूजा का विधान है। लोग सिलबट्टे को भू-देवी मानकर पूजन करते हैं। इस दिन सिलबट्टे को दूध और पानी से स्नान कराया जाता है। इसके बाद सिलबट्टे को सिंदूर, चंदन लगाकर उस पर पुष्प और हल्दी अर्पित की जाती है। आगे जाने सूर्य देव की पूजा विधि।
मिथुन संक्रांति पर इस विधि से करें सूर्यदेव की पूजा
- मिथुन संक्रांति के दिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़े दें और नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद स्नान करें।
- इसके बाद तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें रोली, लाल फूल डालकर उगते सूर्य को 'ॐ घृणि सूर्याय नम:' इस मंत्र का जाप करते हुए अर्घ्य दें।
- इसके बाद आसन लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव के मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें या आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करें।