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Jivitputrika Vrat Katha: संतान की लंबी आयु के लिए रखा जाता है जितिया व्रत, पूजा के दौरान जरूर पढ़ें ये व्रत कथा

Sun, 18 Sep 2022 09:00 AM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशिकी पटेल Updated Sun, 18 Sep 2022 09:00 AM IST
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Jivitputrika Vrat Katha Jitiya Vrat Ki Katha In Hindi
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - फोटो : iStock

Jivitputrika Vrat Katha: सनातन धर्म में संतान प्राप्ति और उनकी मंगल कामना के लिए कई तरह के व्रत और पर्व का जिक्र किया गया है। इन्हीं में से एक है जीवित्पुत्रिका या जितिया पर्व। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। इस साल ये व्रत 18 सितंबर को रखा जाएगा। हर साल महिलाएं अपनी संतान की सुख समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना के साथ ये व्रत रखती हैं। मान्यता है कि जितिया व्रत करने से संतान की लंबी उम्र होती है और उनके जीवन में किसी भी प्रकार की विपदा नहीं आती है। जितिया व्रत के दिन व्रत रखकर संध्याकाल में अच्छी तरह से स्न्नान किया जाता है और पूजा की सारी वस्तुएं लेकर पूजा की जाती है। साथ ही व्रत कथा जरूर पढ़ा जाता है। व्रत कथा के बिना जितिया पूजा अधूरी मानी जाती है। ये रही जितिया व्रत कथा...

Jivitputrika Vrat Katha Jitiya Vrat Ki Katha In Hindi
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - फोटो : iStock
जितिया व्रत कथा को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था। तब से महिलाएं आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण व्रती स्त्रियों की संतानों की रक्षा करते हैं।
Jivitputrika Vrat Katha Jitiya Vrat Ki Katha In Hindi
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - फोटो : istock

जितिया व्रत से जुड़ी दूसरी मान्यता के अनुसार, गंधर्वों के एक राजकुमार थे, जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े ही धर्मात्मा, परोपकारी और सत्यवादी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में प्रभु का स्मरण करने चले गए। लेकिन उनका मन राज कार्य में नहीं लगा। वे राज-पाट की जिम्मेदारी अपने भाइयों को देकर अपने पिता की सेवा के उद्देश्य से उनके पास वन में चले गए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ। 

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जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - फोटो : iStock

एक दिन वन में भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वह काफी डरी हुई थी और रो रही थी। दयालु जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे। रोते हुए वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है। इस पर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा कि डरो मत, तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपड़े से ढक कर शिला पर लेटूंगा। नियत समय पर जीमूतवाहन पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए। लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई। 

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जीवित्पुत्रिका व्रत कथा - फोटो : iStock

पक्षीराज गरुड़ जीमूतवाहन के साहस, परोपकार और मदद करने की भावना से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया और कहा कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। इस तरह से जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा की। तभी से संतान की सुरक्षा और सुख के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हो गई। माताओं के लिए ये व्रत बहुत फलदाई है।

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