Jivitputrika Vrat Puja Vidhi, Shubh Muhurat, Parana Time: आज जितिया व्रत मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व होता है। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत करने का विधान है। ये व्रत महिलाओं के लिए बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि इस व्रत को महिलाएं निर्जला रहकर करती हैं। इस पर्व को जीवित्पुत्रिका, जिउतपुत्रिका, जितिया, जिउतिया और ज्युतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि माताएं ये व्रत पुत्र प्राप्ति, संतान के दीर्घायु होने एवं उनकी सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए करती हैं। इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखकर व्रत का अनुष्ठान करती हैं। इस व्रत के दौरान कई सावधानियां बरतनी पड़ती हैं और कई नियमों का पालन करना पड़ता है। इसलिए व्रत के दौरान सभी नियमों का सावधानीपूर्वक पालन करें। आइए जानते हैं जितिया व्रत के बारे में कथा नियम और पूजा सामग्री समेत सारी जानकारी।
Jitiya Vrat 2022: आज है जीवितपुत्रिका व्रत,जानें नहाय-खाए विधि, पूजा सामग्री, व्रत कथा नियम समेत सारी जानकारी
जीवित्पुत्रिका व्रत का शुभ मुहूर्त
17 सितंबर को दोपहर 2 :14 मिनट पर अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी और 18 सितंबर दोपहर 4 : 32 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।
उदया तिथि के अनुसार, जितिया का व्रत 18 सितंबर 2022 को रखा जाएगा।
इसका पारण 19 सितंबर को प्रातः 6: 10 मिनट के बाद व्रत का पारण किया जा सकता है।
पूजा सामग्री
जीवित्पुत्रिका व्रत में भगवान जीमूत वाहन, गाय के गोबर से पूजा का विधान है। जीवित्पुत्रिका व्रत में खड़े अक्षत(चावल), पेड़ा, दूर्वा की माला, पान, लौंग, इलायची, पूजा की सुपारी, श्रृंगार का सामान, सिंदूर, पुष्प, गांठ का धागा, कुशा से बनी जीमूत वाहन की मूर्ति, धूप, दीप, मिठाई, फल, बांस के पत्ते, सरसों का तेल, खली, गाय का गोबर जरूरी है।
पूजन विधि
पौराणिक कथा
जितिया व्रत की कथा के अनुसार, गंधर्वों के एक राजकुमार थे, जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े ही धर्मात्मा, परोपकारी और सत्यवादी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में प्रभु का स्मरण करने चले गए। लेकिन उनका मन राज कार्य में नहीं लगा। वे राज-पाट की जिम्मेदारी अपने भाइयों को देकर अपने पिता की सेवा के उद्देश्य से उनके पास वन में चले गए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ। एक दिन वन में भ्रमण करते हुए उनकी भेंट एक वृद्धा से हुई, जो नागवंश से थी। वह काफी डरी हुई थी और रो रही थी। दयालु जीमूतवाहन ने उससे उसकी ऐसी स्थिति के बारे में पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया कि नागों ने पक्षीराज गरुड़ को वचन दिया है कि प्रत्येक दिन वे एक नाग को उनके आहार के रूप में देंगे। रोते हुए वृद्धा ने बताया कि उसका एक बेटा है, जिसका नाम शंखचूड़ है। आज उसे पक्षीराज गरुड़ के पास जाना है। इस पर जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा कि डरो मत, तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपड़े से ढक कर शिला पर लेटूंगा। नियत समय पर जीमूतवाहन पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत हो गए। लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को गरुड़ अपने पंजों में दबोच कर साथ लेकर चल दिए। उस दौरान उन्होंने जीमूतवाहन की आंखों में आंसू निकलते देखा और कराहते हुए सुना। वे एक पहाड़ पर रुके, तो जीमूतवाहन ने सारी घटना बताई। पक्षीराज गरुड़ जीमूतवाहन के साहस, परोपकार और मदद करने की भावना से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को प्राणदान दे दिया और कहा कि वे अब किसी नाग को अपना आहार नहीं बनाएंगे। इस तरह से जीमूतवाहन ने नागों की रक्षा की। तभी से संतान की सुरक्षा और सुख के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हो गई। माताओं के लिए ये व्रत बहुत फलदाई है।