चाणक्य नीति: इन बातों को ध्यान में रखकर मात-पिता किशोरावस्था में बच्चों को दिखा सकते हैं सही राह
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चाणक्य कहते हैं कि जब बच्चे बड़े होने लगते हैं और वे किशोरावस्था में प्रवेश करने लगते हैं तो माता पिता को इस समय अधिक सर्तकता बरतनी चाहिए। किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे बच्चों के साथ अभिभावकों को मित्रों की तरह व्यवहार करना चाहिए। यह उम्र बदलाव की होती है। इस उम्र में बच्चों की मनोदशा में परिवर्तन होता है। वे चीजों और परिस्थितियों को अपने अनुसार समझकर उसके प्रति राय बनाते हैं।
चाणक्य के अनुसार किशोरावस्था के समय बच्चे नई-नई चीजों को देखते समझते हैं। नए दोस्त बनाते हैं। ऐसे में यदि वह किसी गलत व्यक्ति को दोस्त बनाते हैं या कुछ गलती करते हैं तो उन्हें डांटने की बजाय में प्रेम से समझाने की जरूरत होती है, क्योंकि इस उम्र में बच्चों की मनोदशा बहुत संवेदनशील होती। अगर वे गलत दिशा में जा रहे हैं तो उन्हें विनम्रता के साथ उन्हें अच्छे और बुरे के बारे में अंतर करना बताएं।
संवादहीनता किसी भी रिश्ते के लिए नुकसानदायक है। चाणक्य के अनुसार बड़े होते बच्चों और माता पिता के बीच संवाद हीनता नहीं होनी चाहिए। बच्चों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करना चाहिए। उनकी हर बात को ध्यान पूर्वक सुनना चाहिए ताकि वे अपनी हर बात आपको बता सकें और गलत दिशा की तरफ अग्रसर न हों।