{"_id":"5e3d3cdd8ebc3ee5d21f87a7","slug":"bilva-patra-significance-and-importance","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"अपार है बिल्वपत्र की महिमा, इसकी जड़ों में है महादेव का वास और वातावरण को भी करता है शुद्ध","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
अपार है बिल्वपत्र की महिमा, इसकी जड़ों में है महादेव का वास और वातावरण को भी करता है शुद्ध
रेणु जैन
Published by: योगेश जोशी
Updated Sun, 09 Feb 2020 10:11 AM IST
विज्ञापन
1 of 5
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
Link Copied
बिल्वपत्र के वृक्ष को श्रीवृक्ष भी कहा गया है। मान्यता है कि इसकी जड़ों में महादेव का वास है। तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी हों, तो उसे त्रिदेव का रूप मानते हैं। किंवदंती है कि एक बार पार्वती ने अपनी उंगलियों से अपने ललाट पर आया पसीना पोछकर फेंक दिया। उनके पसीने की कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं। उसी से बेलवृक्ष उत्पन्न हुआ। इसके ज्यादातर पेड़ों को मंदिरों के आसपास ही लगाया जाता है।
2 of 5
शिवपुराण में वर्णित है कि घर पर बेल का वृक्ष लगाने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि जिस स्थान पर यह पौधा या वृक्ष होता है, वह काशी तीर्थ के समान पवित्र और पूजनीय स्थल हो जाता है। इसका प्रभाव यह होता है कि घर का हर सदस्य यशस्वी तथा तेजस्वी बनता है। साथ ही ऐसे परिवार में सभी सदस्यों के बीच प्रेम भाव रहता है। घर में किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा नहीं आती।
3 of 5
प्रदूषण की मार झेलते शहरों में वातावरण को शुद्ध बनाए रखने में बिल्वपत्र का वृक्ष महत्वपूर्ण है। यह वृक्ष अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध तथा पवित्र बनाए रखता है। इस पेड़ के प्रभाव के कारण आसपास सांप या अन्य विषैले जीव-जंतु भी नहीं फटकते।
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 5
बेलपत्र तोड़ने के नियमों को ध्यान में रखते हुए पूजा करना ही श्रेष्ठ होता है। टूटे हुए बेलपत्र यदि अच्छी अवस्था में हों तो एक से अधिक बार भी शिवपूजा में उपयोग किए जा सकते हैं। ध्यान रखें कि बेलपत्र सूखे और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में न हों।
विज्ञापन
5 of 5
आचार्य चरक तथा कई अन्य आयुर्वेदिक पद्धतियों में बेल को पाचन के लिए औषधि माना गया है। पेट के रोगों, आंतों से संबंधित परेशानियाें, पुरानी पेचिश, दस्त तथा बवासीर में बेल बहुत उपयोगी है। इससे आंतों की कार्यक्षमता बढ़ने के साथ भूख भी खुलती है तथा इंद्रियों को बल मिलता है। कुछ लोग इसके फल के गूदे को डिटर्जेंट के रूप में भी उपयोग करते हैं, यानी कि यह कपड़े धोने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। कई चित्रकार अपने रंगों में बेल मिलाते हैं। यह चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगा देता है।
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।