Kanwar Yatra 2026: सावन का महीना आते ही देशभर में भक्ति और आस्था का अनोखा माहौल देखने को मिलता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज जैसे पवित्र स्थानों से गंगाजल लेकर लंबी पैदल यात्रा पर निकलते हैं, जिसे कांवड़ यात्रा कहा जाता है। यह यात्रा केवल जल लाकर भगवान शिव पर चढ़ाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें अनुशासन, संयम और सच्ची श्रद्धा की परीक्षा भी शामिल होती है। धार्मिक ग्रंथों में कांवड़ यात्रा से जुड़े कई नियम और परंपराएं बताई गई हैं, जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
Kanwar Yatra 2026: कांवड़ यात्रा में क्या करें, क्या न करें? जानें जलाभिषेक का पूरा नियम
kanwar yatra 2026: धार्मिक ग्रंथों में कांवड़ यात्रा से जुड़े कई नियम और परंपराएं बताई गई हैं, जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
कांवड़ का जल किसे चढ़ाया जाता है?
कांवड़ यात्रा का मुख्य उद्देश्य भगवान शिव का जलाभिषेक करना होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था, जिससे उनके शरीर में तीव्र जलन उत्पन्न हुई। उस समय देवताओं ने पवित्र नदियों का जल अर्पित कर उन्हें शीतलता प्रदान की। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज भी शिवभक्त सावन में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।
जलाभिषेक करने की सही विधि
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय विधि-विधान का ध्यान रखना जरूरी होता है। सबसे पहले स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध करें। मंदिर में प्रवेश करने से पहले हाथ-पैर धोकर मन को शांत करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते रहें। जलाभिषेक के दौरान उत्तर दिशा की ओर मुख करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे भगवान शिव का निवास स्थान माना गया है।
जल अर्पित करने की प्रक्रिया भी एक क्रम में की जाती है। सबसे पहले जल की कुछ बूंदें जलाधारी के दाहिने और बाएं भाग में अर्पित करें, जो गणेश जी और कार्तिकेय जी को समर्पित मानी जाती हैं। इसके बाद मध्य भाग में थोड़ा जल अर्पित करें और अंत में शिवलिंग पर धीरे-धीरे गंगाजल की धारा चढ़ाएं। अभिषेक के बाद शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है और जलाधारी को लांघना वर्जित होता है।
इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
कांवड़ यात्रा के दौरान नियमों का पालन बहुत जरूरी होता है, क्योंकि छोटी-सी गलती भी यात्रा को अधूरा बना सकती है। कांवड़ को कभी जमीन पर नहीं रखा जाता। विश्राम के समय इसे किसी ऊंचे स्थान या स्टैंड पर टांगना चाहिए। यदि कांवड़ जमीन से छू जाए, तो जल अशुद्ध माना जाता है।
इसके अलावा यात्रा के दौरान चमड़े से बनी वस्तुओं का उपयोग नहीं किया जाता। सात्विक भोजन करना और नशे से दूर रहना भी अनिवार्य होता है। शौच या विश्राम के बाद बिना स्नान किए कांवड़ को स्पर्श नहीं करना चाहिए।
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