ज्येष्ठ माह की विनायक चतुर्थी आज है। विनायक चतुर्थी के दिन गणपति महाराज की विधि-विधान से पूजा की जाती है। प्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी का व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जातकों के समस्त प्रकार के विघ्न, संकट मिट जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, गणेश भगवान सभी देवताओं से पहले पूजे जाते हैं। हर-पूजा पाठ का प्रारंभ उन्हीं के आवाह्न के साथ होता है। गणपति महाराज शुभता, बुद्धि, सुख-समृद्धि के देवता माना जाता है। जहां भगवान गणेश का वास होता है वहां पर रिद्धि सिद्धि और शुभ लाभ भी विराजते हैं। इनकी पूजा से आरंभ किए गए किसी कार्य में बाधा नहीं आती है इसलिए गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है। विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का विधि-विधान के साथ पूजन करने एवं कथा का सुनने से घर में सौभाग्य और सुख, समृद्धि में वृद्धि होती है।
Vinayaka Chaturthi 2021: विनायक चतुर्थी आज, जानें पूजा मुहूर्त, व्रत विधि, महत्व और कथा
चतुर्थी तिथि 13 जून 2021 रविवार रात 9 बजकर 40 मिनट से प्रारंभ हो चुकी है। यह तिथि आज 14 जून 2021 दिन सोमवार रात 10 बजकर 34 मिनट पर समाप्त होगी। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त आज सुबह 10:48 बजे से दोपहर 01:35 बजे तक है।
सुबह उठ कर स्नान करें। स्नान करने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। भगवान गणेश को स्नान कराएं। स्नान के बाद भगवान गणेश को साफ वस्त्र पहनाएं। भगवान गणेश को सिंदूर का तिलक लगाएं। सिंदूर का तिलक अपने माथे में भी लगाना चाहिए। गणेश भगवान को दुर्वा अतिप्रिय होता है। भगवान गणेश को दुर्वा अर्पित करना चाहिए। गणेश जी को लड्डू, मोदक का भोग लगाएं। गणेश जी की आरती करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विनायक चतुर्थी का विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भगवान गणेश की पूजा करने से कार्यों में किसी भी तरह की कोई रुकावट नहीं आती है। इसलिए गणपति महाराज को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है।
विनायक चतुर्थी के पौराणिक कथा
एकबार माता पार्वती एक बालक की मूर्ति बनाकर उसमें जान फूंकती हैं। इसके बाद वे कंदरा में स्थित कुंड में स्नान करने के लिए चली जाती हैं। लेकिन जाने से पहले माता अपने पुत्र को आदेश देती हैं कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी व्यक्ति को कंदरा में प्रवेश नहीं करने देना। बालक अपनी माता के आदेश का पालन करने के लिए कंदरा के द्वार पर पहरा देने लगता है। कुछ समय बीत जाने के पश्चात भगवान शिव वहां पहुंचते हैं। भगवान शिव जैसे ही कंदरा के अंदर जाने लगते हैं तो वह बालक उन्हें रोक देता है। महादेव बालक को समझाने का प्रयास करते हैं। लेकिन वह उनकी एक नहीं सुनता है। जिससे क्रोधित होकर भगवान शिव त्रिशूल से बालक का शीश धड़ से अलग कर देते हैं।
इस घटना का पता जब माता पार्वती को हुआ तो वह स्नान करके कंदरा से बाहर आती हैं और देखती हैं कि उनका पुत्र धरती पर प्राण विहीन पड़ा है। उसका शीश उसके धड़ से अलग कटा हुआ है। यह दृष्य देखकर माता क्रोधित होती हैं। जिसे देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं। तब भगवान शिव अपने गणों को आदेश देते हैं कि ऐसे बालक का सिर ले आओ जिसकी माता की पीठ उसके बालक की ओर हो। शिवगण एक हथनी के बालक का शीश लेकर आते हैं। भगवान शिव गज के शीश को बालक के धड़ से जोड़कर उसे जीवित कर देते हैं। इसके बाद माता पार्वती शिवजी से कहती हैं कि यह शीश गज का है जिसके कारण सब मेरे पुत्र का उपहास करेंगे। तब भगवान शिव बालक को वरदान देते हैं कि आज से संसार इन्हें गणपति के नाम से जानेगा। इसके साथ ही सभी देव भी उन्हें वरदान देते हैं कि आज से वह प्रथम पूज्य हैं।