Vishnu Chalisa Lyrics: हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को फाल्गुन पूर्णिमा कहते हैं। यह तिथि विशेष रूप से होलिका दहन और होली के पर्व से जुड़ी होती है। इस दिन होलिका दहन किया जाता है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा से जुड़ा है। इस दिन स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
Phalguna Purnima: फाल्गुन पूर्णिमा पर जरूर करें चालीसा का पाठ, होगी सभी मनोकामना पूर्ण
Vishnu Chalisa Path Benefits: विष्णु चालीसा का पाठ जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाता है। विशेष रूप से फाल्गुन पूर्णिमा पर इसे पढ़ने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता, संकट और दुख दूर होते हैं।
विष्णु चालीसा का पाठ करने के लाभ
दरिद्रता का नाश
विष्णु चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता दूर होती है। आर्थिक संकटों का समाधान होता है और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
समृद्धि और वैभव की प्राप्ति
भगवान विष्णु की पूजा और चालीसा के पाठ से घर में समृद्धि का वास होता है। हर काम में सफलता मिलती है और जीवन में वैभव और सुख-शांति आती है।
जीवन में खुशहाली और सफलता
विष्णु चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और खुशहाली आती है। नौकरी, व्यापार, परिवार और अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है। सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन के सारे कष्ट समाप्त हो जाते हैं।
विष्णु चालीसा का पाठ कैसे करें
- फाल्गुन पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु का पूजन करें।
- पूजा के समय विष्णु चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करें।
- यदि संभव हो तो ओंकार या मंत्रों का जाप भी करें।
- भगवान विष्णु के चरणों में दीपक और फूल अर्पित करें।
विष्णु चालीसा
॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय,सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ,दीजै ज्ञान बताय॥
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी।कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत।सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
तन पर पीताम्बर अति सोहत।बैजन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे।देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन।दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण।कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण।केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा।रावण आदिक को संहारा॥
आप वाराह रूप बनाया।हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया।चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया।रूप मोहनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया।असुरन को छबि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया।मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया।कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया।उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई।शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
हार पार शिव सकल बनाई।कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी।वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने धुरू प्रहलाद उबारे।हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे।बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे।कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे।दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन।करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूं नहीं योग्य जप पूजन।होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण।विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुँ आपका किस विधि पूजन।कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुँ प्रणाम कौन विधिसुमिरण।कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सिवकाई।हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई।निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ।भव बन्धन से मुक्त कराओ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ।निज चरनन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै।पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।