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नारद जयंती: पिता के श्राप से रहे अविवाहित, राजा दक्ष के 10 हजार पुत्रों को किया राजपाठ से दूर

Tue, 01 May 2018 09:19 AM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 01 May 2018 09:19 AM IST
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narad jayanti 2018 importance and significance
हिन्दू पंचाग के अनुसार प्रत्येक ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की द्वियीया तिथि को नारद जयंती मनाई जाती है। इस बार यह 1 मई 2018 को पड़ रही है। आमतौर पर नारद जयंती बुद्ध पूर्णिमा के एक दिन बाद मनाई जाती है। पुराणों और शास्त्रों की मान्याताओं के अनुसार देवर्षि नारद सृष्टि पहले ऐसे संदेश वाहक यानी पत्रकार थे जो एक लोक से दूसरे लोक की परिक्रमा करते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया करते थे। 
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पुराणों के अनुसार महर्षि नारद का जन्म भगवान ब्रह्राा जी की गोद से हुआ था इसलिए इन्हें ब्रह्रााजी के मानस पुत्र की माना गया है। नारद जी का सम्मान ना सिर्फ देवी-देवता करते थे बल्कि ऋषि और असुर भी करते थे। नारद जी भगवान विष्णु के परम भक्त थे और वे हमेशा नारायण-नारायण का जप करते रहते थे। नारद जी को मिले श्राप के कारण वह कभी एक स्थान पर नहीं टिकते थे। 

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शास्त्रों के अनुसार ब्रह्रााजी ने नारद जी से सृष्टि के कामों में हिस्सा लेने और विवाह करने के लिए कहा लेकिन उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने से मना कर दिया। तब क्रोध में बह्रााजी ने देवर्षि नारद को आजीवन अविवाहित रहने का श्राप दे दिया।

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वहीं दूसरे श्राप के कारण इन्हें हमेशा इधर से उधर भटकते रहना पड़ा। दरअसल राजा दक्ष की पत्नी आसक्ति से 10 हजार पुत्रों का जन्म हुआ था लेकिन नारद जी ने सभी को मोक्ष की शिक्षा देकर राजपाठ से वंचित कर दिया था। इस बात से क्रोधित होकर राजा दक्ष ने नारद जी को श्राप दे दिया कि वह हमेशा इधर-उधर भटकते रहेंगे और एक स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएंगे।
 
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