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Dussehra 2025: बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है दशहरा, जानिए इससे जुड़ी 10 प्रमुख परंपराएं

Sun, 28 Sep 2025 10:59 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Sun, 28 Sep 2025 10:59 AM IST
सार

Dussehra 2025: दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं। हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। यह हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य महत्व भगवान राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ा है।

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Dussehra 2025 date importance and rituals in hindi know kab hai Dussehra
दशहरा 2025 - फोटो : अमर उजाला

शैली प्रकाश 


 

Dussehra 2025: दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं। हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। यह हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य महत्व भगवान राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ा है। यह पर्व सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि बुराई, अहंकार और अन्याय को खत्म कर सत्य और धर्म की स्थापना का प्रतीक है। इस साल दशहरा 2 अक्तूबर, 2025 को मनाया जाएगा। भारत के हर कोने में, इस दिन को अलग-अलग परंपराओं और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आइए, दशहरा की 10 प्रमुख परंपराओं को विस्तार से जानें।

Dussehra 2025 date importance and rituals in hindi know kab hai Dussehra
दशहरे के दिन सबसे महत्वपूर्ण परंपरा है रावण दहन। बुराई के प्रतीक रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के विशाल पुतले बनाकर उन्हें जलाया जाता है। - फोटो : instagram

रामलीला का मंचन
दशहरा, शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन आता है। उत्तर भारत में 9 दिनों तक चलने वाली रामलीला का भव्य मंचन होता है। यह भगवान राम के जीवन और रावण से हुए उनके युद्ध को दर्शाती है। रामलीला का समापन दशहरे की पूर्व संध्या पर होता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले का दहन
दशहरे के दिन सबसे महत्वपूर्ण परंपरा है रावण दहन। बुराई के प्रतीक रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के विशाल पुतले बनाकर उन्हें जलाया जाता है। ये पुतले पटाखों और आतिशबाजी से भरे होते हैं। शाम के समय हजारों की भीड़ के सामने इन पुतलों को जलाना, रावण के अहंकार और बुराई के अंत को दर्शाता है।

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विजयादशमी के दिन शक्ति और विजय की कामना के लिए शस्त्र पूजा का विशेष महत्व है। - फोटो : adobe stock

शस्त्र पूजा की परंपरा
विजयादशमी के दिन शक्ति और विजय की कामना के लिए शस्त्र पूजा का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इसी दिन पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान छिपाए गए शस्त्रों को वापस निकाला था और कौरवों पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए, इस दिन लोग अपने शस्त्रों और औजारों की पूजा करते हैं।

अपराजिता देवी की आराधना
दशहरे के दिन अपराजिता देवी की पूजा का भी विधान है, जिन्हें देवी दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन महिषासुर का वध कर माता कात्यायनी विजयी हुई थीं। इसलिए, विजय की कामना के लिए इनकी पूजा की जाती है।

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पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में, दशहरा दुर्गा पूजा के समापन का दिन होता है। इस दिन, देवी दुर्गा की मूर्तियों को विधि-विधान से जल में विसर्जित किया जाता है। - फोटो : freepik

दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन
पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में, दशहरा दुर्गा पूजा के समापन का दिन होता है। इस दिन, देवी दुर्गा की मूर्तियों को विधि-विधान से जल में विसर्जित किया जाता है। इसके बाद, लोग एक-दूसरे से मिलकर दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं देते हैं।

शमी पूजा और 'सोना' बांटना
दशहरा पर शमी के पेड़ की पूजा की जाती है। इस पेड़ को 'सोने का पेड़' भी कहते हैं। पूजा के बाद इसके पत्तों को 'सोना' मानकर एक-दूसरे को भेंट किया जाता है, जो समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक है। कहा जाता है कि भगवान राम ने रावण से युद्ध से पहले शमी की पूजा की थी।

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दशहरे का दिन 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है, यानी यह इतना शुभ होता है कि किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए पंचांग देखने की जरूरत नहीं होती। - फोटो : adobe stock

विशेष पकवानों का स्वाद
दशहरा बिना स्वादिष्ट पकवानों के अधूरा है। इस दिन कई घरों में पूरी-हलवा, खीर, दही वड़ा और जलेबी-फाफड़ा जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। गिलकी के पकौड़े और गुलगुले भी कई क्षेत्रों में विशेष रूप से बनाए जाते हैं, जो इस त्योहार के स्वाद को और बढ़ा देते हैं।

नए कार्य की शुरुआत
दशहरे का दिन 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है, यानी यह इतना शुभ होता है कि किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए पंचांग देखने की जरूरत नहीं होती। लोग इस दिन नए वाहन, घर खरीदते हैं या नए व्यवसाय की शुरुआत करते हैं।

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