मेरा जन्म 1952 में हुआ था। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद मैंने पंजाब विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई की। किसी भी पेशेवर कूटनीतिक की तरह मैंने भी इतिहास, लोकनीति और प्रशासन, अंतरराष्ट्रीय संबंध और कानून तथा आर्थिक विकास जैसे विषयों का गहन अध्ययन किया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ने से पहले मैंने कई वर्षों तक भारतीय विदेश सेवा में राजनयिक के तौर पर अपने करियर को संवारा है। मैंने भारत सरकार की स्थायी सचिव के रूप में काम किया है। साथ ही मैं विभिन्न देशों में भारतीय राजदूत भी नियुक्त रही हूं।
कई चुनौतियों का किया सामना, आज हैं संयुक्त राष्ट्र के 6 शीर्ष राजनयिकों में से एक
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मां ने बनाया मजबूत
मेरी मां अपने आप में एक विशेष महिला थीं। अपने जमाने में वह एक मजबूत नारीवादी महिला थीं। मेरा जन्म तब हुआ था, जब मेरी मां 45 साल की थीं। वह महाराष्ट्र की पहली स्नातकोत्तर महिला थीं, जो उनकी पीढ़ी में एक बहुत ही दुर्लभ बात थी। दरअसल मेरी नानी की मौत एक बच्चे के जन्म के दौरान हो गई थी, जिसके बाद मेरे नाना ने फैसला किया था कि वह अपनी दोनों बेटियों की जल्दी शादी नहीं करेंगे। उन्हें एहसास हो गया था कि कम उम्र के कारण ही उनकी पत्नी की मृत्यु हुई है। मेरी मां पढ़ पाईं, इसके पीछे इस कहानी का बड़ा हाथ था। चूंकि महिलाओं के अधिकारों के प्रति मेरी मां संजीदा थीं, इसलिए मेरा उनके जैसा होना बहुत ही स्वाभाविक था। उन्होंने हर मौके पर मुझे प्रेरित किया।
कई चुनौतियां झेली हैं
परिवार को संभालना किसी महिला के लिए सबसे बड़ी चुनौती होता है। आईएफएस ज्वॉइन करने से पहले यह नियम था कि कोई भी महिला इस जिम्मेदारी के दौरान शादी नहीं कर सकती। साथ ही विदेशी दौरों पर मिलने वाले खर्च में काफी असमानता थी। इसके अलावा महिलाओं को हर स्तर पर खुद को साबित करना पड़ता था। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाजी माहौल में भी किसी महिला को अपना सुविधा क्षेत्र तलाश पाना मुश्किल था। मैं सौभाग्यशाली रही कि अपने पति की मदद से मैंने इन सभी चुनौतियों से आसानी से पार पा लिया। मैंने अपना काम किया और हर किसी ने उसे मान्यता दी।
जब बैठक में जाने से रोक दिया गया
मैं वर्ष 1981 में पाकिस्तान में भारतीय दूतावास के अवर सचिव के रूप में तैनात थीं। हर साल पाकिस्तान में आने वाले सिख जत्थों के साथ लाइजन ऑफिसर (मध्यस्थ अधिकारी) के रूप में तत्कालीन राष्ट्रपति जिया-उल-हक से मिलना था, लेकिन मुझे बैठक में प्रवेश करने से पहले रोक दिया गया, क्योंकि मैं एक महिला थी। इस प्रोटोकॉल के बावजूद पाकिस्तान में तत्कालीन भारतीय उच्च आयुक्त नटवर सिंह मुझे बैठक में ले गए। बैठक में राष्ट्रपति जिया-उल-हक आश्चर्यचकित थे। दस मिनट के भीतर ही मुझे बताया गया कि राष्ट्रपति की बेगम साहिबा बगीचे में मेरा चाय पर इंतजार कर रही हैं। बैठक में अपनी जरूरत न देख मैंने तुरंत ही बेगम के साथ चाय पीना पसंद किया। यह घटना उन तमाम मौकों में से एक है, जब मुझे एक महिला होने पर दुनिया में फर्क देखना पड़ा है।
-'पावर ऑफ वन' अवॉर्ड से सम्मानित संयुक्त राष्ट्र के छह राजनयिकों में से एक महिला के साक्षात्कारों पर आधारित।