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कैंसर ने सूनी की गोद लेकिन अब 50 बच्चों की मां, तुझे सलाम

Thu, 14 Dec 2017 10:11 AM IST
मीना राणा
मीना राणा Updated Thu, 14 Dec 2017 10:11 AM IST
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bashindey meena rana mother of 51 child
meena rana

मैं मूलतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कुदाना गांव की रहने वाली हूं। तीस साल पहले मेरी शादी बागपत जिले के निवासी वीरेंद्र राणा से हुई थी। शादी के कई साल बीत जाने के बावजूद हमें संतान सुख नहीं मिला। समय ज्यादा हो गया, तो हमने डॉक्टर से सलाह ली। जांच हुई, तो पता चला कि मुझे गर्भाशय का कैंसर है।

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बीमारी की सूचना मिलते ही मेरे और पति के अरमानों पर पानी फिरना लाजिमी था। फिर भी हमने संतान प्राप्ति की उम्मीद छोड़ी नहीं थी। इसके लिए मैंने आसपास के शहरों समेत दिल्ली तक इलाज कराया। लेकिन मां बनने की मेरी ख्वाहिश पूरी होती नहीं दिखी। उल्टा मेरा खुद का स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा।
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अंग्रेजी दवाएं आजमाने के बाद मेरे पति ने आयुर्वेद का सहारा लेने की कोशिश की, जिसके लिए 1990 में हम मुजफ्फरनगर के पास स्थित शुक्रताल आ गए। आयुर्वेदिक उपचार से धीरे-धीरे मेरी तबीयत ठीक होने लगी, पर मां बनने का सुख हर बीतते क्षण के साथ मुझसे दूर जाता दिख रहा था।
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आखिरकार मैंने अपने पति के साथ मिलकर एक साल के एक बच्चे को गोद लेने का फैसला किया। हमने मिलकर उसका नाम रखा- मांगेराम। लेकिन शायद नियति को मेरा मां बनना पसंद ही नहीं था। मैं मातृत्व सुख भोगने के शुरुआती चरण में ही थी कि किस्मत ने पांच साल में ही मांगेराम को हमसे छीन लिया।

इस घटना से मुझे पहले से भी ज्यादा दुख हुआ। लेकिन इस घटना का सुखद पहलू यह रहा कि मैंने तय कर लिया कि अब केवल एक बच्चे को ही नहीं, बल्कि जितने संभव हो सकेंगे, उतने बेसहारा बच्चों को गोद लेकर उनका सहारा बनूंगीं। मैंने अनाथ बच्चों के लिए एक आश्रयस्थल संचालित करने का निर्णय लिया। 

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मेरे फैसले का मेरे पति ने भी समर्थन किया। इसी प्रयास में शुक्रताल के पास खाली पड़ी ग्राम सभा की आठ बीघे की जमीन हमें दान में मिल गई। हमने मिलकर इस जमीन पर अनाथालय के साथ एक स्कूल भी शुरू किया। एक अदद संतान की बाट जोहने वाली मुझ जैसी महिला को धीरे-धीरे दर्जनों बच्चे मां पुकारने लगे।

जाति, धर्म के बंधन से परे केवल इंसानियत की पहचान लिए ये बच्चे बीतते वक्त के साथ यहां बड़े होते गए। मुझमें भी इन बेसहारा बच्चों का मजहब जानने की दिलचस्पी कभी नहीं रही। मेरा ध्यान हमेशा से ही इनकी पढ़ाई और अच्छी परवरिश पर रहा। ढाई दशक के इस सफर में मेरे पाले कई बच्चे बड़े होकर बाहर नौकरी करने भी चले गए हैं। इनमें से कइयों की शादी भी हो गई है। कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जो अब भी मेरे पास ही रहते हैं और वर्तमान में कॉलेज से बीए-एमए जैसी उच्च शिक्षा ले रहे हैं।

इस वक्त हमारे अनाथालय में करीब 50 बच्चे रह रहे हैं, जिनमें से कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हैं। इस काम के लिए हमें लोगों से चंदा मिलता है, मगर अनाथालय संचालित करने में होने वाले खर्च का अधिकांश हिस्सा मेरे पति की कमाई से आता है, जो बागपत में अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती-बाड़ी करके कमाते हैं।

कई पड़ोसी हमें खाद्यान्न की भी मदद देते हैं। मेरा मानना है कि यदि आपके साथ कुछ बुरा होता है, तो यह घटना कई दूसरे जरूरतमंदों के चेहरों की मुस्कान की वजह बन सकती है। अगर मैं भी अपनी सूनी कोख लेकर निष्क्रिय बैठ जाती, तो आज इतने सारे बच्चों की मां बनने का सुख कैसे ले पाती!

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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