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Ujjain News: चमत्कार का जीवंत प्रमाण, कैसे प्रकट हुए भगवान शिव? जानें महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की अनसुनी कथा
Thu, 24 Jul 2025 09:41 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: आशुतोष प्रताप सिंह
Updated Thu, 24 Jul 2025 09:41 AM IST
सार
श्रावण मास में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में उमड़ रही है। यह ज्योतिर्लिंग अद्भुत और स्वयंभू है, जिसकी स्थापना से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएं हैं।
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श्रद्धा, चमत्कार और शक्ति की अनसुनी गाथा
- फोटो : अमर उजाला
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श्रावण मास के पावन अवसर पर देशभर से लाखों श्रद्धालु उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन को पहुंच रहे हैं। इस पवित्र स्थल को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से विशेष बनाती हैं। महाकाल मंदिर के पुजारी पं. महेश शर्मा ने बताया कि यह ज्योतिर्लिंग स्वयंभू और दक्षिणमुखी है, जिसकी स्थापना भगवान शिव ने स्वयं की थी।
जब अधर्म के अंत के लिए प्रकट हुए भगवान महाकाल
- फोटो : अमर उजाला
राजा चंद्रसेन, बालक की भक्ति और हनुमान की उपस्थिति से जुड़ी कथा
पं. महेश शर्मा के अनुसार, उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा राजा चंद्रसेन, एक पांच वर्षीय बालक और भगवान हनुमान से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके मित्र शिवगण मणिभद्र ने उन्हें एक दिव्य चिंतामणि दी थी। इस मणि के प्रभाव से राजा की कीर्ति फैलने लगी, जिससे अन्य शासक ईर्ष्यावश उस पर आक्रमण करने लगे। संकट के समय राजा शिव भक्ति में लीन हो गए। इसी दौरान एक विधवा गोपी अपने छोटे बालक के साथ मंदिर दर्शन को पहुंची। राजा को ध्यान में लीन देख बालक भी भक्ति में रम गया और घर जाकर शिवलिंग की पूजा करने लगा। जब उसकी मां ने क्रोधवश पूजा सामग्री फेंकी, तभी वहां शिव स्वयं प्रकट हुए और एक सुंदर मंदिर के साथ स्वयंभू ज्योतिर्लिंग प्रकट हो गया। इस चमत्कारिक दृश्य को देख सभी चकित रह गए। राजा चंद्रसेन, आक्रमणकारी शासक और स्वयं हनुमानजी वहां पहुंचे और बालक की भक्ति की सराहना की। तभी से इस स्थल पर दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना मानी जाती है।
पं. महेश शर्मा के अनुसार, उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा राजा चंद्रसेन, एक पांच वर्षीय बालक और भगवान हनुमान से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके मित्र शिवगण मणिभद्र ने उन्हें एक दिव्य चिंतामणि दी थी। इस मणि के प्रभाव से राजा की कीर्ति फैलने लगी, जिससे अन्य शासक ईर्ष्यावश उस पर आक्रमण करने लगे। संकट के समय राजा शिव भक्ति में लीन हो गए। इसी दौरान एक विधवा गोपी अपने छोटे बालक के साथ मंदिर दर्शन को पहुंची। राजा को ध्यान में लीन देख बालक भी भक्ति में रम गया और घर जाकर शिवलिंग की पूजा करने लगा। जब उसकी मां ने क्रोधवश पूजा सामग्री फेंकी, तभी वहां शिव स्वयं प्रकट हुए और एक सुंदर मंदिर के साथ स्वयंभू ज्योतिर्लिंग प्रकट हो गया। इस चमत्कारिक दृश्य को देख सभी चकित रह गए। राजा चंद्रसेन, आक्रमणकारी शासक और स्वयं हनुमानजी वहां पहुंचे और बालक की भक्ति की सराहना की। तभी से इस स्थल पर दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना मानी जाती है।
उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी अनसुनी और दिव्य कहानी
- फोटो : अमर उजाला
दूषण राक्षस वध और धरती से प्रकट महाकाल की कथा
महाकाल मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अवंती (वर्तमान उज्जैन) में वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करते थे। उसी दौरान रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस का आतंक बढ़ता गया, जो ब्राह्मणों की धार्मिक गतिविधियों में विघ्न डालता था। शिव भक्तों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने पहले उसे चेतावनी दी, लेकिन जब उसने हमला कर दिया, तब भगवान शिव धरती को चीरकर ‘महाकाल’ रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध कर दिया। इसके बाद शिव ने दूषण की भस्म से स्वयं का श्रृंगार किया। भय से मुक्त ब्राह्मणों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उसी स्थान को अपना स्थायी निवास बनाया, जो आज महाकालेश्वर मंदिर के रूप में श्रद्धा का केंद्र है।
महाकाल मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अवंती (वर्तमान उज्जैन) में वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करते थे। उसी दौरान रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस का आतंक बढ़ता गया, जो ब्राह्मणों की धार्मिक गतिविधियों में विघ्न डालता था। शिव भक्तों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने पहले उसे चेतावनी दी, लेकिन जब उसने हमला कर दिया, तब भगवान शिव धरती को चीरकर ‘महाकाल’ रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध कर दिया। इसके बाद शिव ने दूषण की भस्म से स्वयं का श्रृंगार किया। भय से मुक्त ब्राह्मणों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उसी स्थान को अपना स्थायी निवास बनाया, जो आज महाकालेश्वर मंदिर के रूप में श्रद्धा का केंद्र है।
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उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की अद्भुत गाथा
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श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक
इन कथाओं के चलते महाकालेश्वर मंदिर ना केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है, बल्कि शिवभक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र भी है। श्रावण मास में यहां भस्म आरती सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिन्हें देखने हजारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
इन कथाओं के चलते महाकालेश्वर मंदिर ना केवल 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है, बल्कि शिवभक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र भी है। श्रावण मास में यहां भस्म आरती सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिन्हें देखने हजारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
