इन आईपीएस ने मुश्किल वक्त में बेहतर रणनीति बनाकर खुद को किया साबित, साथियों का रखते थे खास ध्यान
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लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इनमें गुरुदर्शन सिंह की अलग पहचान थी। संवेदनशील हालात से निपटने के लिए उनके पास हमेशा बेहतर रणनीति रहती थी।
राजधानी के एसएसपी की कुर्सी कांटों के ताज से कम नहीं होती। सरकार की छवि खराब न हो और विरोधी दल भी नाराज न हो, ऐसा संतुलन हर कोई नहीं बना सकता। आईपीएस गुरुदर्शन सिंह ऐसे ही अधिकारी रहे, जिन्होंने सरकार के मुश्किल वक्त में बेहतर रणनीति बनाकर खुद को साबित किया तो विरोधी दल के नेताओं के भी प्रिय बने रहे।
22 अक्तूबर 1994 को राजधानी के एसएसपी बने गुरुदर्शन सिंह के कार्यकाल में राज्य कर्मचारियों ने जोरदार आंदोलन किया था। उस वक्त समाजवादी पार्टी की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। विधानसभा में राज्यपाल का अभिभाषण होना था।
हजारों राज्य कर्मचारियों ने विधानसभा भवन का घेराव करने का एलान कर दिया। कांग्रेस और भाजपा भी उनके समर्थन में आ गई। मुख्यमंत्री ने एसएसपी गुरुदर्शन सिंह को बुलाकर लाठीचार्ज और किसी भी प्रकार की सख्ती से साफ मना कर दिया था। कहा कि राज्यपाल का अभिभाषण और उनकी सुरक्षा तथा विधायक और मंत्रियों की सुरक्षा से कोई कोताही भी न हो।
खाना-पीना भूलकर सुनते थे जनता की समस्याएं
गुरुदर्शन सिंह ने रातों-रात 200 पुलिसकर्मी चुने और गांधी भवन से कुर्ता-पाजामा और खद्दर की शर्टें व धोती खरीदीं। विधानसभा भवन को तीन स्तर पर 20-20 फुट ऊंची बैरीकेडिंग से घेर दिया गया। धोती-कुर्ता और शर्ट-पाजामा पहने पुलिसकर्मियों को सुबह होने वाले प्रदर्शन में बैरीकेडिंग के पास ही रहने के निर्देश दिए।
उनसे कहा गया कि वह धरना-प्रदर्शन में सरकार के खिलाफ खूब नारेबाजी करें, जिससे किसी को शक न हो। बैरीकेडिंग पर कोई चढ़ने की कोशिश करे तो उसकी टांग पकड़कर खींच ले। कोई विरोध करे तो उस पर धरना-प्रदर्शन खराब करने का दोष मढ़ दें। पुलिसकर्मियों ने ऐसा ही किया और राज्यपाल का अभिभाषण शांतिपूर्वक निपटकर उन्हें आराम से रवाना किया गया। विधायक-मंत्रियों को भी कोई समस्या नहीं हुई।
आईपीएस गुरुदर्शन सिंह ऐसे अधिकारी थे जो जनता की समस्याएं सुनने के लिए खाना-पीना तक भूल जाते थे। वह मातहतों से कहते थे कि जनता समस्या लेकर भटकती रहती है और कोई सुनने वाला नहीं होता। अगर कोई धैर्य से पीड़ा सुन ले तो लोगों का आधा दर्द कम हो जाता है।
गुरुदर्शन सिंह मातहतों का खास ख्याल भी रखते थे। उनकी समस्याओं से लेकर सुविधाओं तक हर विषय पर जानकारी लेते थे। जब भी कोई पुलिसकर्मी गलती करता तो वह अफसरों के सामने उसका बचाव करते थे। वह मातहतों की गलतियां खुद पर ओढ़ लेते थे।