तापमान माइनस 32 डिग्री सेल्सियस...। भारी भरकम कपड़ों के बावजूद हाथ-पैर सुन्न करते बर्फानी हवा के थपेड़े...। पलकों पर बर्फ की बारीक परत...। पर, हौसला बुलंद। एक-एक कदम आगे बढ़े और सपने को पूरा किया। यह कहना है लखनऊ की पूर्वा धवन का, जो माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने का सपना संजोकर एवरेस्ट बेस कैंप पहुंची। 31 दिसंबर की दोपहर ढाई बजे बेस कैंप पहुंचकर पूर्वा ने लखनऊ का नाम रोशन किया। बेस कैंप की ऊंचाई 17,598 फीट है। ‘अमर उजाला’ से मंगलवार को हुई बातचीत में उन्होंने अपने साहसिक व रोमांचकारी अनुभव साझा किए। पेश है बातचीत पर आधारित रिपोर्ट...।
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पूर्वा धवन
- फोटो : amarujala
पूर्वा ने बताया कि 20 दिसंबर को लखनऊ से काठमांडू के लिए रवाना हुई। 23 दिसंबर से एवरेस्ट बेस कैंप की चढ़ाई शुरू हुई। रोजाना अधिक से अधिक चढ़ाई की कोशिश होती थी। कुल आठ दिनों में बेस कैंप पहुंचे जबकि वापसी में तीन दिन लगेंगे। छह से सात घंटे तक रोजाना चढ़ाई करने के बाद घुटने बोल गए थे। पांच जनवरी को कैंप समाप्त हो रहा है।
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पूर्वा धवन
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25 पर्वतारोहियों की टीम एवरेस्ट बेस कैंप के लिए रवाना हुई, लेकिन जैसे-जैसे कारवां आगे बढ़ता गया पर्वतारोहियों की हिम्मत भी जवाब देती रही। पर, मैंने हार नहीं मानी। 20 पर्वतारोही एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचे जबकि वापसी में तीन पर्वतारोहियों के घुटनों ने जवाब दे दिया और फिर उन्हें हेलीकॉप्टर की मदद से नीचे लाया गया।
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पूर्वा धवन
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पूर्वा ने बताया कि एवरेस्ट पर न्यूनतम तापमान माइनस में होता है और भयंकर तूफानी हवाएं चलती हैं। सफर पूरा करने के बाद जब कैंप में हम खाने के लिए बैठते थे तो पीने का पानी उबाल लेते थे। पर, कई बार ऐसा हुआ कि जब पानी पीने के लिए उठाया तो वह जम चुका होता था और उसे फिर से उबालना पड़ता था।
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पूर्वा धवन
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एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने के बाद पूर्वा की हिम्मत डबल हो गई। पूर्वा बताती हैं कि हौसला इतना बढ़ गया कि काला पत्थर पर चढ़ाई की योजना बना डाली। काला पत्थर की ऊंचाई बेस कैंप से भी अधिक है। पर, उस पर भी तिरंगा फहरा दिया। इस कैंप ने मुझे बहुत ही यादगार मोमेंट दिए हैं और नए दोस्त भी।