इन अफसर की कुछ अलग ही थी बात, जुर्म और जुल्म के शिकार लोगों की व्यक्तिगत स्तर पर करते थे मदद
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लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इनमें परेश पांडेय की अलग पहचान थी। उन्हें आम जनता का दोस्त बनकर उनका दुख-दर्द बांटने वाले अधिकारी के रूप में जाना जाता था।
लखनऊ के बाशिंदों में परेश पांडेय का नाम एक जनप्रिय पुलिस अफसरों में शुमार है। उन्होंने अपने कॅरिअर की शुरुआत एक अंग्रेजी अखबार में पत्रकार के तौर पर की थी। कुछ महीने बाद ही वह शिक्षा के क्षेत्र में आ गए और नेपाल की राजधानी काठमांडू के एक कॉलेज में लेक्चररशिप की।
हालांकि, उनका यह सफर भी छोटा ही रहा और वर्ष 1987 में उन्होंने पुलिस सेवा जॉइन की। पत्रकारिता और शिक्षा क्षेत्र का अनुभव उनके काफी काम आया और उन्होंने पूरे सेवाकाल में सोशल पुलिसिंग ही की। फरियादियों को वह कभी दुखी और निराश नहीं होने देते थे। जुर्म और जुल्म के शिकार लोगों को हिम्मत बंधाकर उनकी व्यक्तिगत स्तर पर मदद करते थे।
करीब 20 साल पहले महानगर सर्किल के सीओ और फिर पश्चिमी सर्किल में बतौर एएसपी तैनात रहते हुए उन्होंने फरियादियों का ऐसा दिल जीता कि आज भी उनकी सह्रदयता, सज्जनता, मृदुभाषी व मददगार स्वभाव के चर्चे होते हैं।
एक पुलिस अधिकारी के तौर पर वह जनता की मदद के लिए और अपराधियों से निपटने के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहते थे। उन्होंने हमेशा ‘क्विक रिस्पांस’ दिया। राजाजीपुरम में खुनखुन जी ज्वैलर्स के घर पर आधी रात को बदमाशों के धावे की सूचना के 10 मिनट बाद ही वह न सिर्फ मौके पर पहुंचे बल्कि अगले आधे घंटे में ही एक बदमाश को मुठभेड़ में मार गिराया था।
परेश पांडेय ऐसे पुलिस अफसर थे जो घटनास्थल जरूर जाते थे। वारदात चाहे छोटी हो या बड़ी, वह सभी जगह मौके पर पहुंचते और मातहतों को खुलासे के टिप्स देते थे। उनका मानना था कि घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने पर कई ऐसे साक्ष्य मिल जाते हैं जिनसे अपराधियों का सुराग लगाना और वारदात का खुलासा करना काफी आसान हो जाता है।
परेश पांडेय का मानना था कि घटनास्थल अपराध से जुड़े कई पहलुओं का अध्ययन कराता है। वारदात करने का तरीका और अपराध की शैली से लेकर अपराधी के स्तर के बारे में घटनास्थल से अच्छी जानकारी कोई और हीं दे सकता। वह कहते थे अपराध और अपराधी को कभी छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए।
छोटे-छोटे बदमाशों को अगर पुलिस नजरअंदाज करती रहेगी तो एक दिन वह बड़ा अपराधी बन जाता है और समाज व कानून व्यवस्था के लिए मुसीबत बन जाता है इसलिए शुरू से ही उस पर लगाम कसना जरूरी होता है।