सोनम लववंशी
जीवन संध्या में सुरक्षा की जरूरत होती है। अपनी उम्र के लोगों का साथ चाहिए होता है और सबसे बढ़कर सुकून की तलाश होती है। शहरों में ऐसी टाउनशिप आकार लेने लगी हैं, जहां बुजुर्गों की ये सारी जरूरतें पूरी होती हैं। जीवन में तीन पड़ाव बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। पहला है बचपन, जब हम जन्म लेते हैं और वयस्क होने तक घर-गृहस्थी में व्यस्त रहते हैं। उसके बाद जीवन का एक लंबा दौर आता है, जब हम जिम्मेदारियां निभाते हुए अपना परिवार बसाते हैं। फिर जीवन का संधिकाल होता है, जब हम सारी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने लिए जीना चाहते हैं। यही वह समय होता है, जब हम पीछे पलटकर अपनी जिंदगी के सफर का मूल्यांकन करते हैं। परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए जिन अरमानों को मन के किसी संदूक में छुपा रखा था, उनको पूरा करना चाहते हैं।
साठ से ज्यादा की उम्र ही जीवन का वह सही समय है, जब जीवन-साथी के साथ निश्चिंतता के साथ जीया जा सकता है। ऐसे में कोई भी नहीं चाहता कि उसने जो काम जीवन भर किया, वह इस दौर में भी उसकी दिनचर्या में शामिल हो। आर्थिक आजादी के साथ वह मानसिक आजादी भी चाहता है, लेकिन बिना किसी जिम्मेदारी के। वह नहीं चाहता कि उसके बाथरूम का नल खराब हो जाए तो प्लंबर ढूंढे या बिजली का कोई प्लग ठीक कराने इलेक्ट्रीशियन का नंबर तलाशे। वह किसी का मोहताज न हो और उसे जो करना हो, वह सब करे।
यह इच्छा किसी दृष्टि से गलत भी नहीं कही जा सकती। यही वजह है कि आधुनिकता के इस दौर में जिंदगी के प्रति बुजुर्गों का नजरिया बदलता जा रहा है। अब वे अपनी रिटायरमेंट लाइफ को लेकर उतना चिंतित नहीं रहते हैं। वे जानते हैं कि यह एक ऐसा पड़ाव है, जहां उनके पास तजुर्बों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने जवानी में ही अपने जीवन की ढलती शाम की तैयारी कर रखी है। बचपन में लड़खड़ाते कदम से लेकर जवानी में बुलदिंयों के शिखर तक खुद को इतना मजबूत बना लिया है कि अब वृद्धावस्था का भय नहीं रहा है।
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बढ़ते एकल परिवार
देश में लगातार एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में विदेशों की तर्ज पर देश में भी रिटायरमेंट हाउसिंग या रिटायरमेंट विला की डिमांड बढ़ रही है। हमारे देश की आबादी वर्तमान में तकरीबन 1 अरब 40 करोड़ है, जिसमें से 10.1 फीसदी आबादी बुजुर्गों की है, यानी 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की आबादी। एनएसओ के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में देश में बुजुर्गों की आबादी 13 करोड़ 80 लाख थी, जो कि अगले एक दशक में 41 फीसदी बढ़कर 19 करोड़ 40 लाख हो जाएगी।
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अपनेपन का अहसास
महाराष्ट्र के लवासा में बनी ऐसी ही टाउनशिप में रहने वाले एक सीनियर सिटीजन ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा चेन्नई में बिताया। फिर अपने बेटे की नई नौकरी की पोस्टिंग के कारण मुंबई चले आए। लेकिन मुंबई में किराया बहुत ज्यादा है और वहां की व्यस्तता उनकी उम्र के व्यक्ति के लिए रहने लायक भी नहीं थी। बच्चे काम के सिलसिले में अक्सर विदेश यात्रा करते रहते थे।
आखिरकार उन्होंने अपनी चेन्नई की संपत्ति बेचकर लवासा में एक रिटायरमेंट विला खरीदने का फैसला किया। 2013 में पश्चिमी घाट की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरे आशियाना उत्सव में 1,550 वर्ग फुट के अपार्टमेंट में रहने चले आए। यहां वह सब कुछ है, जो उनकी जरूरत के लिए होना चाहिए। यहां तक कि पत्नी का खाना बनाने का मूड नहीं होता तो कैफेटेरिया में चले जाते हैं। वीकएंड पर बच्चे भी आ जाते हैं, इसलिए ऐसा नहीं लगता कि उनसे अलग रहते हैं।
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- फोटो : अमर उजाला।
कारोबार का रूप
वेदांत बृंदावनम, कोयंबटूर के कीनाथूखदावु में एक आनंदमय सेवानिवृत्ति समुदाय है, जो पिछले कई वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है। पश्चिमी घाट की घाटियों में स्थित यह रिटायरमेंट विला वयोवृद्धों को हर प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराता है। इसी की तर्ज पर देश के अन्य हिस्सों में भी रियल एस्टेट के कारोबारियों ने अब ऐसी टाउनशिप की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है।
शुरुआती समय में यह ऋषिकेश, बनारस और कुछ धार्मिक शहरों तक सीमित था, लेकिन इतना सुविधाजनक नहीं था। अब इस विचार को लगातार विस्तार मिल रहा है। ऐसी ही परियोजनाएं चलाने वाले आशियाना हाउसिंग के अंकुर गुप्ता ने कुछ साल पहले कहा था कि रिटायरमेंट के बाद कहां रहा जाए? इस विचार में बहुत ज्यादा बदलाव आया है। अब सीनियर सिटीजन पहले की तुलना में कहीं ज्यादा स्वतंत्र और निश्चिंत हैं। उनकी मानसिकता बदल रही है और वे जीवन के इस दौर में बेहतर समय गुजारना चाहते हैं।इन टाउनशिप में घरेलू सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे उनके बच्चों को भी खुशी है। इन टाउनशिप में क्लब हाउस, डाइनिंग, एक्टिविटी हॉल, रीडिंग रूम, योगा होम, बिल भुगतान सेवाएं, चिकित्सा सहायता, मूवी थिएटर और स्विमिंग पूल, सब कुछ है।
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- फोटो : Pixabay
व्यस्तता का इंतजाम
इन टाउनशिप और कॉलोनियों में रहने वाले रिटायर्ड लोग खुद को व्यस्त रखें, इसके लिए भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। गार्डनिंग क्लब बनाए गए हैं, जहां अपनी रुचि के अनुसार वे खुद को व्यस्त रखते हैं। आस-पास के कुछ गांवों को गोद लेकर वहां जनसेवा का काम भी करते हैं। रिटायर डॉक्टर्स, लोगों का इलाज करते हैं तो जो एजुकेशन से जुड़े थे, वे अब वहां कोचिंग देते हैं। इसके साथ ही स्वच्छता को लेकर भी गांव वालों को अपने अनुभव से कुछ न कुछ सिखाते हैं। आशय यह कि इन जगहों पर अपनी रुचि के अनुसार सब कुछ करने की सुविधा और आजादी है। कोई बंधन नहीं है और न ही कोई बोलने वाला।