Dussehra Celebration Places: भारत में दशहरा सिर्फ रावण दहन और भगवान राम की विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह देश की समृद्ध संस्कृति, धार्मिक आस्था और क्षेत्रीय परंपराओं का भी प्रतीक है। देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी को मनाने के तरीके इतने अनूठे हैं कि हर जगह इस त्योहार का एक नया रंग देखने को मिलता है। कहीं राजसी ठाठ-बाट के साथ भव्य शोभायात्रा निकलती है, तो कहीं सैकड़ों देवी-देवताओं की पालकियां एकत्र होती हैं।
दशहरा 2026: मैसूर से कुल्लू तक, देश के इन शहरों में अलग अंदाज में मनाया जाता है दशहरा
Dussehra 2026: 20 अक्तूबर 2026 को दशहरा मनाया जा रहा है। देशभर में दशहरा अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। कहीं 75 दिन का उत्सव होता है तो कहीं रावण की पूजा होती है।
मैसूर: शाही अंदाज में दशहरा
कर्नाटक का मैसूर दशहरा अपनी भव्यता और ऐतिहासिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां उत्सव का संबंध देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय से है। मैसूर पैलेस को रोशनी से सजाया जाता है और विजयादशमी के दिन प्रसिद्ध जंबू सवारी निकाली जाती है। इस शोभायात्रा में सजे हुए हाथी, पारंपरिक झांकियां, संगीत और लोककलाओं की शानदार झलक देखने को मिलती है। यहां दशहरा धार्मिक आस्था के साथ राजसी विरासत का भी उत्सव है।
कुल्लू: जहां सैकड़ों देवी-देवता होते हैं शामिल
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में दशहरा देश के अन्य हिस्सों से अलग तरीके से मनाया जाता है। यहां उत्सव विजयादशमी के दिन शुरू होकर लगभग एक सप्ताह तक चलता है। ढालपुर मैदान में आसपास के गांवों से सैकड़ों देवी-देवताओं की सुसज्जित पालकियां पहुंचती हैं। भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा, पारंपरिक वाद्ययंत्र और कुल्लू नाटी इस उत्सव को खास बनाते हैं। यहां का दशहरा हिमाचल की लोकसंस्कृति और देव परंपरा का अनूठा संगम है।
कोलकाता: दुर्गा पूजा और सिंदूर खेला
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दशहरा दुर्गा पूजा के समापन से जुड़ा है। यहां विजयादशमी पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। विवाहित महिलाओं के बीच प्रचलित सिंदूर खेला इस अवसर की खास पहचान है। ढाक की गूंज, आकर्षक पूजा पंडाल और भावुक विदाई का दृश्य उत्सव को यादगार बनाते हैं।
दिल्ली: रामलीला और रावण दहन
दिल्ली में दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण रामलीला और रावण दहन है। शहर के विभिन्न मैदानों में भगवान राम की कथा का मंचन किया जाता है। विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। आतिशबाजी, मेले और खानपान के स्टॉल उत्सव की रौनक बढ़ाते हैं। यहां दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश जन-जन तक पहुंचाता है।