श्वेता और केशव जब 12वीं में थे, तभी से लगाव महसूस करते थे। एक-दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं थी, कोई स्वार्थ नहीं। बस मिलना, साथ रहना, बातें करना अच्छा लगता था। साथ—साथ ग्रेजुएशन पूरा किया। एक साथ कॉलेज और कोचिंग सेंटर में आते-जाते। इसके बाद दोनों की नौकरी लग गई और श्वेता की शादी भी तय हो गई। श्वेता ने फोन पर केशव को यह बात बताई। उनके बीच प्रेम तो था, लेकिन निस्वार्थ था। आज भी दोनों अच्छे अंतरंग दोस्त हैं।
दरअसल, प्रेम जीवन के सुखद एहसासों में से एक है। प्रेम में आप अपने पार्टनर से क्या चाहते हैं? आकर्षण, चाहत, रोमांस, शादी, घर, परिवार और बहुत कुछ। पर क्या आपने कुछ ऐसे रिश्ते देखे हैं, ऐसा प्यार देखा है, जिसमें बहुत गहरा लगाव, निस्वार्थ भाव, अटूट विश्वास, समझदारी, ईमानदारी जैसे जज्बातों से ज्यादा और कोई स्वार्थ नहीं होता।
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प्लेटोनिक प्रेम निष्काम होता है
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महान दार्शनिक प्लेटो के नाम से जाना जाने वाला प्लेटोनिक प्रेम निष्काम होता है। साधारण शब्दों में इसे अफलातूनी प्यार कहा जाता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक इस अहसास को, इस अनुभूति को व्यक्त करना बहुत मुश्किल है। इसे महज आकर्षण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आकर्षण समय के साथ कम हो जाता है, लेकिन प्लेटोनिक प्रेम अनाम रिश्तों के बावजूद हमारी मधुर स्मृतियों में संचित रहता है। समझना मुश्किल होता है कि आखिर यह कैसा रिश्ता है? किसी एक के ही प्रति पनपता है। वक्त के साथ यह बढ़ता ही है घटता नहीं। कब, कहां, कौन, कैसे किसी मन को लुभाने लगता है। रोमांस और वासना से दूर आखिर यह कैसा रिश्ता होता है!
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Rabindranath Tagore
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देश का राष्ट्रगान लिखने वाले दार्शनिक, कवि, एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर ने प्रेम पर भी खूब सारी रचनाएं लिखी। उनमें से ही एक मशहूर रचना है, गीतांजलि। साल 1914 में अर्जेंटीना में एक लड़की ने उनकी इस रचना का फ्रेंच में पाठ किया। 25 साल की यह मशहूर नारीवादी लेखिका विक्टोरिया ओकैम्पो टैगोर की कविताओं की दीवानी हो गईं। इसके 10 साल बाद 1924 में टैगोर जब पेरू की यात्रा के दौरान बीमार पड़े तो उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा था। कई भाषाओं की जानकार ओकैम्पो से उनकी मुलाकात हुई, उनकी बुद्धिमता से प्रभावित हुए और उन्हें अपना प्रेरणास्रोत माना। टैगोर और ओकैम्पो के बीच जो पवित्र और अप्रतिम प्रेम था, उसे प्लेटोनिक लव कहा गया। विद्वानों ने बौद्धिक प्रेम और आध्यात्मिक प्रेम के रूप में भी इसका विवरण किया है।
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Rabindranath Tagore with Ocampo
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टैगोर ओकैम्पो से इतने प्रभावित हुए कि उनको समर्पित कविताएं भी लिखीं। उनकी ये रचनाएं पूर्वी नाम से प्रकाशित हुई हैं। टैगोर अपने जीवन में ओकैम्पो से महज दो बार ही मिले। दोनों की दूसरी और अंतिम मुलाकात साल 1930 में हुई। टैगोर जबतक जीवित रहे, दोनों के बीच पत्र व्यवहार चलता रहा। वे ओकैम्पो को प्यार से विजोया बुलाते थे। दोनों के पत्रों में उनके बौद्धिक प्रेम और प्रगाढ़ रिश्तों की साफ झलक मिलती है। शारीरिक आकर्षण से दूर दोनों का यह विशुद्ध आध्यात्मिक एहसास दो अलग देशों और संस्कृति के बीच मिसाल है।
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Saheb Bibi aur Ghulam
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प्रसिद्ध उपन्यासकार बिमल मित्रा की बांग्ला उपन्यास पर साल 1962 में आई फिल्म साहब, बीबी और गुलाम आपने देखी होगी और नहीं देखी तो देखनी चाहिए। इस फिल्म में जमींदार घर की छोटी बहू(मीना कुमारी) और भूतनाथ(गुरुदत्त)के बीच ऐसा ही रिश्ता होता है, जिसमें शरीर की चाहत से परे आत्मिक प्रेम दिखता है। एक दृश्य में छोटी बहू से शराब की गिलास छीनते हुए भूतनाथ उनका हाथ छू लेता है, तो वह बिफर जाती हैं। डांट लगाती है कि पराई स्त्री का हाथ क्यों छुआ! इसे भी प्लेटोनिक लव कहा जाए तो गलत नहीं होगा।