ईरान में तकरीबन एक करोड़ लोग किसी न किसी विकलांगता से ग्रस्त हैं। रुढ़िवादी देश ईरान में सेक्स जैसे विषय पर बात करना वर्जित है तो विकलांग महिलाओं के विषय में सेक्स जैसी बात पर तो सोचा भी नहीं जा सकता। उत्तरी ईरान के एक छोटे से गांव में रहने वाली 41 साल की विकलांग महिला मितरा फराजंदाह अपने ख़ुद के अनुभव और निराशाओं के बारे में बताती हैं। वह कहती हैं, "मैं एक महिला हूं। मैं एक ऐसी महिला हूं जो 75 फीसदी शारीरिक विकलांगता से ग्रस्त है। हां, मैंने प्यार का अनुभव किया है। मैं हमेशा कहती हूं कि जिस शख़्स ने कभी प्यार का अनुभव नहीं किया या वह प्यार में नहीं पड़ा तो वह खेत में पक्षियों को डराने के लिए खड़े एक पुतले की तरह है।"
विकलांगता और सेक्स: ‘मैं विकलांग हूं पर सेक्स मेरी भी जरूरत है’
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11 साल की उम्र में प्यार
मितरा कहती हैं कि जब वह 11 साल की थीं तब उन्होंने अपने एक पड़ोसी के बेटे को लेकर खास भावनाओं को महसूस किया और इन भावनाओं का मतलब वो तब समझ नहीं पाईं। वह कहती हैं, "उन दिनों मैं खुद को इंसान नहीं समझती थी। विकलांगता के कारण लगता था कि मुझे जीने का हक भी नहीं है। मैं मौत के अवांछित क्षण का इंतजार कर रही थी।"मितरा का कहना है कि 14 सालों तक उन्होंने प्यार को अपने सीने में दफन रखा। वह बताती हैं कि 14 साल बाद उन्होंने उस शख़्स और अपने परिवार के आगे यह बताने की हिम्मत की। उस शख़्स ने उन्हें सराहा, लेकिन उनके परिवार ने हामी नहीं भरी।
वह कहती हैं कि कुछ सालों तक उनकी जिंदगी जहन्नुम में तब्दील हो गई, लेकिन उनके प्यार ने उन्हें यह सिखाया कि ख़ुद से प्यार कैसे किया जाना चाहिए।"उस शख़्स से मैंने 30 सालों तक प्यार किया। हालांकि, हम कभी भी साथ नहीं रहे लेकिन विकलांगता की परवाह किए बिना सच यह है कि मैं एक महिला हूं जिसको हर उस चीज की जरूरत होती है जो एक महिला को होती है।"
'सेक्स एक जरूरत है'
मितरा की तमन्ना है कि उनका प्रेमी उन्हें बांहों में भरे और उनके बालों पर हाथ फेरे। वह कहती हैं कि उनके समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं कि उनकी जैसी महिलाएं प्यार करने के लायक नहीं हैं और इससे उन्हें दर्द होता है। वह कहती हैं, "मैं जिसे प्रेम करती हूं उसके साथ मेरे पिता रहने की अनुमति नहीं देते। मेरी तरह कई विकलांग महिलाएं यौन और भावनात्मक जरूरतों को दबाए जाने से पीड़ित हैं।"
"मैं मानती हूं कि सबसे बड़ा बदलाव हमारे अंदर से ही आता है। हमको सबसे अधिक जरूरत अपनी यौन क्षमताओं और सीमाओं को स्वीकार करने की है।" मितरा कहती हैं कि "हमें विश्वास करना चाहिए कि हम पूरी तरह से जीवन जीने के हकदार हैं और विकलांगता की परवाह किए बिना हम इसका पूरा आनंद लें।"