24 साल की गरिमा तीन लड़कों से प्यार करती हैं और वो तीनों उनके बॉयफ़्रेंड हैं. ख़ास बात ये है कि गरिमा के तीनों बॉयफ़्रेंड्स एक-दूसरे को जानते हैं और सभी इन रिश्तों को लेकर सहज हैं। अब सवाल ये है कि क्या कोई शख़्स एक ही वक़्त में तीन लोगों से प्यार कर सकता है? गरिमा इसका जवाब 'हां' में देती हैं। दरअसल वो जिस तरह के रिश्ते मे हैं उसे 'पॉलीएमरस रिलेशनशिप'(Polyamorous relationship) कहते हैं और ऐसे रिश्तों के चलन को पॉलीएमरी(Polyamory) के नाम से जाना जाता है। भारत समेत अब दुनिया भर में लोग इस तरह के रिश्तों के बारे में खुलकर सामने आ रहे हैं।
'मैं सीधे कह देती हूं- हां, मुझे अलग-अलग मर्दों के साथ रिश्ते रखना पसंद है. तो?'
क्या है 'पॉलीएमरस रिलेशनशिप'?
पॉलीएमरी (Polyamory) ग्रीक और लैटिन भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। Poly (ग्रीक) और Amor (लैटिन)। Poly का मतलब है कई या एक से ज़्यादा और Amor यानी प्रेम। यानी कि एक वक़्त में एक से ज़्यादा लोगों से प्यार करने का चलन। पॉलीएमरी की एक सबसे बड़ी और ज़रूरी शर्त है- रिश्तों में ईमानदारी और पारदर्शिता। इस रिश्ते में शामिल हर पार्टनर एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं और सबकी सहमति के बाद ही रिश्ता आगे बढ़ता है।
गरिमा और उनके प्रेमियों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी
मैं तक़रीबन 13-14 साल की रही होऊंगी जब मुझे पहली बार प्यार हुआ। हम दोनों एक दूसरे के साथ काफ़ी ख़ुश थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी मैं किसी और की तरफ़ आकर्षित होने लगी। लेकिन साथ ही मैं अपने पहले पार्टनर को भी नहीं छोड़ना चाहती थी। मगर ऐसा कैसे मुमकिन है कि एक लड़की के दो बॉयफ़्रेंड हों? किशोरावस्था के कुछ साल मेरे लिए बेहद उलझन भरे और तकलीफ़देह थे। मैं गंभीर 'आइडेंटिटी क्राइसिस' (पहचान के संकट) से जूझ रही थी। मेरे कई जानने वालों ने मुझे 'चरित्रहीन' का तमग़ा तक दे दिया। कइयों ने कहा कि मुझे सेक्स की लत है और मुझे मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए। मैं काउंसलर के पास भी गई। मेरी काउंसलर ने मुझे काफ़ी हद तक समझा लेकिन साथ ही ये कहा कि कोई लड़का ये कैसे स्वीकार कर सकता है कि उसकी गर्लफ़्रेड के कई और बॉयफ़्रेंड हों? काउंसलर की बातों ने मुझे एक बार फिर ग्लानि से भर दिया था।इस बीच मैं पढ़ाई के लिए विदेश चली गई। वहां के माहौल ने मुझे ख़ुद को समझने में काफ़ी मदद की। वहां मैंने आधुनिक रिश्तों, सेक्स और इवोल्यूशन पर कई किताबें पढ़ीं। वहां मुझे अपने जैसे कई और लोग मिले जिन्होंने ख़ुद को स्वीकार किया था और वो ख़ुद पर शर्मिंदा नहीं थे। धीरे-धीरे मैं भी ग्लानि और शर्मिंदगी से निकलने लगी और ख़ुद को अपनाने लगी।
साथी तो मिला लेकिन...
विदेश में ही मुझे एक अन्य व्यक्ति में अपना साथी मिला। वो उम्र में मुझसे काफ़ी बड़े और समझदार थे। मैंने उनसे अपने स्वभाव के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि उन्हें मेरे विचारों और ज़िंदगी जीने के तरीके से कोई परेशानी नहीं है। हमें एक-दूसरे से प्यार था और हम ज़िंदगी को भरपूर जीने लगे। लेकिन तब सब कुछ बदल गया जब मैं किसी और के क़रीब जाने लगी। मेरे वो साथी सैद्धांतिक तौर पर तो 'पॉलीएमरी' से सहमत थे लेकिन जब ये असल रूप में उनके सामने आया तो वो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने मुझसे कुछ इस तरह की बातें करनी शुरू कर दीं, मसलन- क्या मेरे प्यार में कोई कमी है? क्या हमारा रिश्ता इतना कमज़ोर है? क्या हमारी सेक्स लाइफ़ अच्छी नहीं है जो तुम किसी और की तरफ़ आकर्षित होने लगी हो? चूंकि मैं उन्हें सब कुछ पहले ही बता चुकी थी इसलिए अब मेरे पास उन्हें समझाने के लिए कुछ भी नहीं था। इस तरह हम धीरे-धीरे दूर होते चले गए।
जब ख़ुद को कहा, 'क़बूल है'
कुछ सालों बाद मैं वापस भारत आ गई। अब मेरे पास पॉलीएमरी के बारे में काफ़ी जानकारी इकट्ठी हो चुकी थी इसलिए मैंने इस बारे में और ज़्यादा पढ़ने के साथ-साथ रिसर्च करना शुरू किया। वक़्त के साथ मुझे पता चला कि भारत में भी बहुत से लोग 'पॉलीएमरस' हैं। अब मैं व्यक्तिगत तौर पर कम से कम 100 ऐसे लोगों को जानती हूं जो ख़ुद को 'पॉलीएमरस' मानते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसके लिए बाक़ायदा कम्युनिटी और सपोर्ट ग्रुप्स बना रखे हैं जहां वो खुल कर बात कर सकते हैं। फ़ेसबुक पर एक ऐसा ही क्लोज़्ड ग्रुप है 'बेंगलुरु पॉलीऐमरी'। ये ग्रुप पॉलीएमरस लोगों के लिए मीटिंग्स, गेट-टुगेदर और स्पीड डेटिंग जैसे कार्यक्रम आयोजित करते हैं। मैं भी उनके एक ऐसे ही इवेंट में गई और वहां जाकर मुझे बहुत अच्छा महसूस हुआ। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अकेली नहीं हूं। कुछ इस तरह मेरी ज़िंदगी वापस ट्रैक पर आने लगी।