आज के समय में महिलाएं अपने परिवार की जिम्मदेारियों और बच्चों की परवरिश के अलावा वो हर जोखिम उठाने को तैयार हैं। जिन जोखिमों को पुरुष झेलते हैं। समाज में इस बेहतरीन बदलाव का श्रेय उन महिलाओं को देना चाहिए। जिन्होंने समाज में आगे बढ़कर इस सोच के लिए जमीन तैयार की। इन्हीं में से एक हैं प्रियां झिंगन। आइए जानते हैं प्रिया झिंगन कैसे महिलाओं के लिए प्रेरणादायी बनीं।
हिमाचल प्रदेश के शिमला शहर में प्रियां झिंगन का जन्म हुआ था। प्रिया के पिता एक पुलिस अफसर थे। इस कारण घर में बहुत सख्त अनुशासन था। इन सबके बावजूद प्रिया खूब शरारतेें करती थीं। प्रिया सिर्फ घर पर ही नहीं स्कूलों में खूब शरारत करती थीं। प्रिया झिंगन ने लोरेटो कॉन्वेंट तारा स्कूल से पढ़ाई की। प्रिया स्कूल भर में अपनी चंचलता के चलते चर्चित रहती थीं।
स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रिया ने लॉ में एडमिशन ले लिया। जब वह अपनी ग्रेजुएशन के थर्ड इयर में थी तब उनका बेचैन होना शुरू हो गया। फौजी बनने का ख्याल अक्सर उनके जेहन में आता रहता। उन्हीं दिनों एक अखबार पढ़ते हुए उन्होंने भारतीय सेना की तरफ से जारी एक इश्तेहार देखा। इस इश्तेहार में सिर्फ पुरुषों की भर्ती की बात लिखी गई थी। सेना में महिलाओं की भर्ती न होने पर उन्होंने चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ को चिट्ठी लिखी और महिलाओं के सेना में न होने से जुड़े सवाल पूछे। पत्र का जवाब सेना प्रमुख की ओर से तीन हफ्ते बाद आया जिसमें लिखा था कि बहुत जल्द ही भारतीय सेना में महिलाओं की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
एक साल गुजर जाने के बाद भी जब कोई भर्ती नहीं आई तो प्रिया ने पिता के कहने पर हाई कोर्ट में प्रशिक्षु के तौर पर दाखिला ले लिया। इसी बीच अखबार में छपे एक इश्तेहार पर प्रिया की नजर पड़ी जिसमें महिलाओं की सेना में भर्ती से जुड़ी जानकारी थी। यहां भी मुश्किल ये थी कि लॉ कर चुकी महिलाओं के लिए केवल दो सीटें खाली थीं। लेकिन प्रिया को अपनी काबिलियित पर पूरा भरोसा था। आखिरकार प्रिया का इंतजार खत्म हुआ और चेन्नई में ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में जाने वाली पहली कैडेट बन गईं। इसी के साथ प्रिया भारतीय सेना में भर्ती होने वाली पहली महिला बन गईं।
प्रिया को मार्च 1993 में जज एडवोकेट जनरल के दफ्तर में तैनात किया गया। सेना में भर्ती होने पर पहली महिला होने के लिहाज़ से उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जवान अन्य अफसरों को सलाम करते थे, लेकिन प्रिय को नहीं। उनमें एक महिला अफसर को अपना सीनियर मानने में संकोच था। उस समय में महिलाओं के लिए अलग से शौचालय भी नहीं बने हुए थे। लेकिन धीरे-धीरे प्रिया ने अपनी बुद्धिमत्ता से सामने आने वाली हर मुश्किल का हल निकाल लिया।