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Mother's Day 2018: मांवां ठंडियां छांवा...7 माएं, बच्चों को दी ऐसी सीख, उन्होंने पा लिया एक मुकाम
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 13 May 2018 05:35 PM IST
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मदर्स डे
मदर्स डे के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं, उन मांओं की कहानियां, जिन्होंने अपने बच्चों को ऐसी सीख दी कि उन्होंने सफलता का शिखर छू लिया।
मदर्स डे
मां, यह शब्द सुनते ही नि:स्वार्थ प्रेम, वात्सल्य, करुणा और समर्पण की वह मूरत सामने आ जाती है, जो जीवन दायिनी है। एक मां ही है जो अपने बच्चे को हर हाल में स्वीकार करती है, उसे हर दुख से बचाती है। जीवन की तेज धूप में मां शीतल छाया की तरह हमेशा साथ रहती है...
मां मुझ से अक्सर कहा करती है/ तेरे रहने से घर में हवा रहती है
उसकी थपकी से जाग न जाऊं/ हल्के-हल्के छुआ करती है...
ऊबड़-खाबड़ इस जीवन को/ करती जाती समतल-समतल
मां मेरी गंगाजल जैसी/ बहती जाती कल-कल, कल-कल...
मां मुझ से अक्सर कहा करती है/ तेरे रहने से घर में हवा रहती है
उसकी थपकी से जाग न जाऊं/ हल्के-हल्के छुआ करती है...
ऊबड़-खाबड़ इस जीवन को/ करती जाती समतल-समतल
मां मेरी गंगाजल जैसी/ बहती जाती कल-कल, कल-कल...
बेटी के साथ निलांबरी जगदाले
दिन भर की थकान बेटी की एक मुस्कान पर कुर्बान: निलांबरी जगदाले
मेरी तीन साल की बेटी है नित्या। ड्यूटी के साथ साथ बेटी की देखभाल करना मुश्किल होता है। दिनभर की सारी थकान नित्या की एक मुस्कान से दूर हो जाती है। कैसे भी करके उसके लिए समय निकालती हूं। जब मैं दफ्तर में होती हूं तो बेटी को केयर टेकर के भरोस छोड़कर आती हूं। बीच बीच में फोन पर उससे बात करती रहती हूं। रात में जब घर पहुंचती हूं तो वह सो चुकी होती है। सुबह पांच बजे उठकर उसके लिए फूड तैयार करने के बाद एक्सरसाइज करती हूं। इसके बाद उसके साथ गार्डन में समय बिताती हूं। फिर ऑफिस के लिए निकल जाती हूं। मेरे पति डा. चैतन्या सेना में मेजर हैं। फिलहाल उनकी पोस्टिंग भूटान में है। उम्मीद है कि अगले महीने उनकी पोस्टिंग कसौली में हो जाएगी। इसके बाद वह भी नित्या से जल्दी-जल्दी मिल पाएंगे। वर्किंग वुमन के लिए बच्चों की देखभाल करना वाकई मुश्किल होता है।
-निलांबरी जगदाले, एसएसपी, यूटी
मेरी तीन साल की बेटी है नित्या। ड्यूटी के साथ साथ बेटी की देखभाल करना मुश्किल होता है। दिनभर की सारी थकान नित्या की एक मुस्कान से दूर हो जाती है। कैसे भी करके उसके लिए समय निकालती हूं। जब मैं दफ्तर में होती हूं तो बेटी को केयर टेकर के भरोस छोड़कर आती हूं। बीच बीच में फोन पर उससे बात करती रहती हूं। रात में जब घर पहुंचती हूं तो वह सो चुकी होती है। सुबह पांच बजे उठकर उसके लिए फूड तैयार करने के बाद एक्सरसाइज करती हूं। इसके बाद उसके साथ गार्डन में समय बिताती हूं। फिर ऑफिस के लिए निकल जाती हूं। मेरे पति डा. चैतन्या सेना में मेजर हैं। फिलहाल उनकी पोस्टिंग भूटान में है। उम्मीद है कि अगले महीने उनकी पोस्टिंग कसौली में हो जाएगी। इसके बाद वह भी नित्या से जल्दी-जल्दी मिल पाएंगे। वर्किंग वुमन के लिए बच्चों की देखभाल करना वाकई मुश्किल होता है।
-निलांबरी जगदाले, एसएसपी, यूटी
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परिवार के साथ शिखा नेहरा
मां बेटी का अनोखा रिश्ता
मैं सेक्टर 7 में अपने घर के सामने खड़ी थी। अचानक एक तीन साल की बच्ची ने पीछे से आकर मुझे मम्मी कहकर पुकारा। मैं चौंकी, देखा गुलाबी रंग की फ्रॉक पहने एक मासूम सी गुड़िया खड़ी थी। तब मेरी उम्र 23 साल थी। मेरी शादी नहीं हुई थी। वह मेरी पड़ोसन प्रोमिला की बेटी भावना थी। इसके बाद तो उससे ऐसा नाता जुड़ा जो आज तक टूटा नहीं। आज मैं खुद एक बेटे की मां हूं। यह नाता भी 21 साल पुराना हो चुका है। मेरा एक 13 साल का बेटा केतन है। लेकिन पहली बार मां शब्द भावना के मुंह से सुनकर जो सुखद अनुभव हुआ उसे बयां नहीं कर सकती। एक ऐसा अहसास जो मुझे अंदर तक छू गया। मैं कुंवारी थी लेकिन भावना ने मुझे मां का दर्जा दे दिया। भले ही नादानी में शुरू हुई यह कहानी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई। आज भावना करनाल में पढ़ाई के लिए चली गई है। लेकिन आज भी वह मुझे मां ही कहती है। अपनी सारी बातें वह अपनी असली मां के बजाय मुझसे शेयर करती है। वह मेरी अच्छी सहेली भी बन गई है। हम मां और बेटी का यह रिश्ता बस रिश्तों से ऊपर है।
-शिखा नेहरा, मीडिया आफिसर, पंजाब राजभवन
मैं सेक्टर 7 में अपने घर के सामने खड़ी थी। अचानक एक तीन साल की बच्ची ने पीछे से आकर मुझे मम्मी कहकर पुकारा। मैं चौंकी, देखा गुलाबी रंग की फ्रॉक पहने एक मासूम सी गुड़िया खड़ी थी। तब मेरी उम्र 23 साल थी। मेरी शादी नहीं हुई थी। वह मेरी पड़ोसन प्रोमिला की बेटी भावना थी। इसके बाद तो उससे ऐसा नाता जुड़ा जो आज तक टूटा नहीं। आज मैं खुद एक बेटे की मां हूं। यह नाता भी 21 साल पुराना हो चुका है। मेरा एक 13 साल का बेटा केतन है। लेकिन पहली बार मां शब्द भावना के मुंह से सुनकर जो सुखद अनुभव हुआ उसे बयां नहीं कर सकती। एक ऐसा अहसास जो मुझे अंदर तक छू गया। मैं कुंवारी थी लेकिन भावना ने मुझे मां का दर्जा दे दिया। भले ही नादानी में शुरू हुई यह कहानी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई। आज भावना करनाल में पढ़ाई के लिए चली गई है। लेकिन आज भी वह मुझे मां ही कहती है। अपनी सारी बातें वह अपनी असली मां के बजाय मुझसे शेयर करती है। वह मेरी अच्छी सहेली भी बन गई है। हम मां और बेटी का यह रिश्ता बस रिश्तों से ऊपर है।
-शिखा नेहरा, मीडिया आफिसर, पंजाब राजभवन
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मां के साथ यूपीएससी टॉपर
मां की प्रेरणा से ही मैंने पाई सफलता
मेरी उम्र तब तीन साल की थी। स्कूल में यूनिट एग्जाम था। उसी दिन मेरे मामा की शादी भी थी। सब शादी में शरीक होने के लिए गुजारिश कर रहे थे लेकिन मेरी मां ने मेरे एग्जाम को प्राथमिकता देते हुए शादी में जाना कैंसल कर दिया। इस छोटे से त्याग से शुरू हुआ सिलसिला बदस्तूर जारी है। हम दो भाई हैं। हमारे कैरिअर के लिए मां ने अपने सारे सुख न्योछावर कर दिए। दो प्रयास में जब मैं यूपीएससी में सफल नहीं हो पाया तो बहुत उदास हो गया। तब वह मां ही थीं, जिन्होंने मुझमे यह भरोसा जगाया कि कोशिशें हमेशा कामयाब होती हैं। मनुष्य को कर्म पर ध्यान देना चाहिए न कि उसके परिणाम पर। इसका ही नतीजा है कि तीसरे प्रयास में मैंने यूपीएससी में 34वीं रैंक पाई। मैं अपनी मां का कर्ज अब समाज सेवा के जरिए चुकाऊंगा।
-गौरव, यूपीएससी में 34वीं रैंक
मेरी उम्र तब तीन साल की थी। स्कूल में यूनिट एग्जाम था। उसी दिन मेरे मामा की शादी भी थी। सब शादी में शरीक होने के लिए गुजारिश कर रहे थे लेकिन मेरी मां ने मेरे एग्जाम को प्राथमिकता देते हुए शादी में जाना कैंसल कर दिया। इस छोटे से त्याग से शुरू हुआ सिलसिला बदस्तूर जारी है। हम दो भाई हैं। हमारे कैरिअर के लिए मां ने अपने सारे सुख न्योछावर कर दिए। दो प्रयास में जब मैं यूपीएससी में सफल नहीं हो पाया तो बहुत उदास हो गया। तब वह मां ही थीं, जिन्होंने मुझमे यह भरोसा जगाया कि कोशिशें हमेशा कामयाब होती हैं। मनुष्य को कर्म पर ध्यान देना चाहिए न कि उसके परिणाम पर। इसका ही नतीजा है कि तीसरे प्रयास में मैंने यूपीएससी में 34वीं रैंक पाई। मैं अपनी मां का कर्ज अब समाज सेवा के जरिए चुकाऊंगा।
-गौरव, यूपीएससी में 34वीं रैंक