क्या आप भी अंधेरे कमरे में मोबाइल पर वीडियो देखते रहते हैं, रील्स स्क्रॉल करते रहते हैं? अगर हां तो सावधान हो जाइए, ये आदत सेहत पर काफी भारी पड़ सकती है।
Mobile Side-Effects: आप भी अंधेर कमरे में चलाते रहते हैं मोबाइल? ये आदत पड़ सकती है भारी
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शाम और रात के समय शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को प्रभावित कर सकती है। यह मेलाटोनिन हार्मोन के बनने की प्रक्रिया को दबा सकती है, जिससे नींद आने में देरी होती है।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञ बताते हैं कि मोबाइल और लैपटॉप जैसी स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी रात के समय शरीर में बनने वाले मेलाटोनिन हार्मोन को दबा सकती है। यही हार्मोन अच्छी और गहरी नींद के लिए जरूरी होता है।
- जब इसका स्तर प्रभावित होता है तो देर से नींद आने, बार-बार नींद टूटने और सुबह थकान महसूस होने जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
- लगातार खराब नींद का असर मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, काम करने की क्षमता और हृदय तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
अगर आप भी रोज रात को लाइट बंद करके मोबाइल चलाते हैं, तो तुरंत ये आदत सुधार लें। आंखों के अलावा अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर पूरी सेहत पर पड़ सकता है।
आंखों पर बढ़ने लगता है दबाव
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार डिजिटल स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग आंखों की थकान बढ़ाता है। कम उम्र के लोगों में आंखों की बढ़ती समस्याओं का ये बड़ा कारण है।
- जब कमरा पूरी तरह अंधेरा होता है और मोबाइल की स्क्रीन बहुत चमकदार होती है, तब आंखों की पुतलियों को बार-बार रोशनी के अनुसार सिकुड़ना और फैलना पड़ता है।
- यह आंखों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
- लंबे समय तक स्क्रीन पर नजरें टिकाने से पलकें कम झपकती हैं, जिससे आंखों की सतह जल्दी सूखने लगती है। इसी कारण आंखों में जलन, भारीपन और थकान महसूस हो सकती है।
ब्लू लाइट का नींद पर असर
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को प्रभावित कर सकती है।
- यह मेलाटोनिन हार्मोन के बनने की प्रक्रिया को दबा सकती है, जिससे नींद आने में देरी होती है।
- अगर रोजाना देर रात तक स्क्रीन देखते हैं तो इससे नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
- लगातार खराब नींद का असर एकाग्रता, मूड, याददाश्त और प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी पड़ सकता है।
बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा
बच्चों और किशोरों की आंखें अधिक संवेदनशील होती हैं। देर रात तक मोबाइल देखने से उनकी नींद और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है।
- स्क्रीन टाइम बढ़ने से बाहर खेलने का समय भी कम होता है, जिसे मायोपिया बढ़ने के जोखिम से जोड़ा गया है।
- विशेषज्ञ बच्चों के लिए सीमित स्क्रीन टाइम और सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन बंद करने की सलाह देते हैं।
इसके अलावा कुछ लोगों में लंबे समय तक मोबाइल देखते रहने से सिरदर्द और माइग्रेन ट्रिगर हो सकता है। तेज रोशनी और लगातार स्क्रीन पर फोकस करने से आंखों की मांसपेशियां थक जाती हैं। जिन लोगों को पहले से माइग्रेन होता है, उनमें स्क्रीन की चमक और कंट्रास्ट परेशानी बढ़ा सकते हैं।
इस तरह के जोखिमों को कम करने के लिए 20-20-20 नियम अपनाएं। इसमें हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें। बार-बार पलकें झपकाएं और स्क्रीन को आंखों से 40-75 सेंटीमीटर दूर रखें।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।