साल 2020-23 तक दुनिया ने कोरोना के खतरनाक दौर का सामना किया। इस दौरान करोड़ों लोग संक्रमण का शिकार हुए, बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। कोरोना के दुष्प्रभाव यानी लॉन्ग कोविड का खतरा भी लंबे समय तक देखा गया। अब हालिया रिपोर्ट थोड़ी राहत देने वाली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में नए वैश्विक स्वास्थ्य अनुमान जारी किए हैं, जिसमें बताया गया है कि कोविड के बाद अब दुनिया की सेहत में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। हालांकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ने स्वास्थ्य की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें राहत और चिंता दोनों साथ दिखाई देती हैं।
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट: कोविड के बाद सेहत में कितना बदलाव आया, कौन सी बीमारियां बढ़ा रहीं दुनिया की टेंशन?
WHO Global Health Estimates: डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में दुनिया की औसत लाइफ एक्सपेक्टेंसी 73.3 साल रही, लेकिन स्वस्थ जीवन प्रत्याशा अभी महामारी से पहले के स्तर से कम है। गैर-संचारी बीमारियां अब 74% मौतों की वजह हैं। दिल की बीमारी सबसे बड़ा बोझ बनी हैं। डायबिटीज, डिमेंशिया और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही है।
डब्ल्यूएचओ का वैश्विक स्वास्थ्य अनुमान
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की लाइफ एक्सपेक्टेंसी में सुधार हुआ है। लाइफ एक्सपेक्टेंसी मतलब है- औसत जीवनकाल। यानी, कोई इंसान औसतन कितने साल जिएगा। जन्म के समय मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं और रहन-सहन के आधार पर वैज्ञानिक एक अंदाजा लगाते हैं कि वह बच्चा कितने साल तक जीवित रह सकता है। इसी औसत उम्र को 'लाइफ एक्सपेक्टेंसी' कहते हैं।
डब्ल्यूएचओ के नए वैश्विक स्वास्थ्य अनुमानों के मुताबिक दुनिया में अब लोग लंबी उम्र तो जी रहे हैं, लेकिन स्वस्थ जीवन के साल घट रहे हैं।
- 2023 में दुनिया की औसत जीवन प्रत्याशा 73.3 साल रही, जो कोरोना महामारी के पहले साल 2019 के 73.4 साल के स्तर के करीब पहुंच गई है।
- हालांकि, लोगों का स्वस्थ जीवनकाल 62.8 साल रही, जो 2019 के मुकाबले करीब 0.4 साल कम है। यानी लोग अधिक समय तक जीवित हैं, लेकिन जीवन के अतिरिक्त वर्षों का बड़ा हिस्सा बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के साथ बीत रहा है।
- वैश्विक स्वास्थ्य का बोझ अब संक्रामक बीमारियों से आगे बढ़कर गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) पर केंद्रित हो रहा है। गैर-संचारी रोगों का मतलब वे क्रॉनिक स्वास्थ्य समस्याएं हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलतीं और आमतौर पर लंबे समय तक बनी रहती हैं।
- 2023 में दुनिया में हुई कुल मौतों में करीब 74% की वजह एनसीडी रहीं, जबकि 2000 में इनका हिस्सा 58% था।
दिल की बीमारियां सबसे बड़ा खतरा
दुनिया में मौत और बीमारी के कुल बोझ की बात करें तो हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियां अब भी सबसे ऊपर हैं।
2023 में सिर्फ इस्केमिक हार्ट डिजीज यानी हृदय तक खून पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट या संकुचन के कारण होने वाली दिल की बीमारी से करीब 95 लाख लोगों की मौत हुई। इस बीमारी के कारण लगभग 21 करोड़ डीएएलवाई का नुकसान हुआ। डीएएलवाई का मतलब है बीमारी, विकलांगता या समय से पहले मौत के कारण स्वस्थ जीवन के जितने साल कम हो जाते हैं, उनका कुल अनुमान।
अच्छी बात ये है कि साल 2000 के बाद दुनिया के कई हिस्सों में दिल की बीमारियों के कारण होने वाले बोझ को कम करने में अच्छी प्रगति हुई है। हालांकि, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में व्यक्तिगत स्तर पर इस बीमारी से जुड़े जोखिम में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बताता है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हृदय स्वास्थ्य को लेकर अभी भी असमानता बनी हुई है।
डायबिटीज और डिमेंशिया का जोखिम
- दूसरी क्रॉनिक बीमारियां भी गंभीर समस्या का कारण रही हैं। 2000 के बाद डायबिटीज से मरने वालों का जोखिम काफी बढ़ा है, खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया में।
- अल्जाइमर रोग और डिमेंशिया में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। 2023 में डिमेंशिया दुनिया में मौत का पांचवां सबसे बड़ा कारण बन गया, जबकि वर्ष 2000 में यह 19वें स्थान पर था। इस अवधि में दुनिया भर में डिमेंशिया से होने वाली मौतें तीन गुना हो गईं।
मानसिक स्वास्थ्य और नशे से जुड़ी बीमारियों का बोझ भी बढ़ा
दुनिया में स्वास्थ्य की बदलती तस्वीर में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियां भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं।
- 2019 से 2023 के बीच निकाली गई डिप्रेशन संबंधी बीमारियों की डीएएलवाई दर में करीब 20% की बढ़ोतरी हुई। वहीं अत्यधिक चिंता से जुड़ी समस्याओं की डीएएलवाई दर करीब 45% बढ़ी।
- अवसाद और चिंता की इन दोनों समस्याओं के कारण 2023 में दुनिया भर में अनुमानित 11 करोड़ साल का स्वस्थ जीवन समय से पहले मौत और विकलांगता के कारण चला गया।
- नशीली दवाओं के इस्तेमाल से जुड़ी बीमारियों में भी दुनिया के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही हैं।
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स्रोत:
New WHO estimates show changing global health landscape
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