क्या आपको कभी ऐसा हुआ है कि कमरे में किसी काम से गए लेकिन वहां पहुंचकर याद ही नहीं रहा कि क्यों आए थे? कभी किसी परिचित का नाम अचानक दिमाग से निकल गया या रोज इस्तेमाल होने वाली चीज का नाम याद करने में भी मेहनत करनी पड़ती है? ऐसी छोटी-छोटी भूल को अक्सर उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
डब्ल्यूएचओ की चेतावनी: भूलने की बीमारी सिर्फ उम्र का असर नहीं, ये स्थितियां भी बढ़ा रही हैं खतरा
डिमेंशिया सिर्फ बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी नहीं है। वायु प्रदूषण, खासकर पीएम2.5, भी इसके जोखिम को बढ़ाने वाले संभावित कारकों में शामिल है। डब्ल्यूएचओ ने अपनी गाइडलाइन में प्रदूषण से बचाव पर जोर दिया है।
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वायु प्रदूषण से डिमेंशिया का खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने डिमेंशिया के जोखिम कारकों पर अपनी गाइडलाइन में वायु प्रदूषण पर भी गंभीरता से ध्यान देते रहने की जरूरत है। भारत जैसे देश के लिए यह चेतावनी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां बड़ी आबादी ऐसे शहरों में रहती है जहां हवा की गुणवत्ता अक्सर चिंता का विषय बनी रहती है।
गौरतलब है कि डिमेंशिया का मतलब केवल चीजें भूलना नहीं है। यह याददाश्त, सोचने-समझने, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता को प्रभावित करने वाली बीमारी मानी जाती है।
एक रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि भारत तेजी से बुजुर्ग होती आबादी वाले देशों में शामिल हो रहा है। ऐसे में याददाश्त कमजोर होने और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का खतरा भी बढ़ रहा है। डब्ल्यूएचओ ने पहली बार अपनी नई गाइडलाइन में वायु प्रदूषण (खास तौर पर पीएम 2.5) को डिमेंशिया के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल किया है।
रोके जा सकते हैं डिमेंशिया के मामले?
रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल दुनियाभर में 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया का शिकार हैं। हर साल करीब 1 करोड़ नए मामले सामने आते हैं। अनुमान है कि यह संख्या 2030 तक 7.8 करोड़ और 2050 तक 13.9 करोड़ पहुंच सकती है। इनमें 60% से अधिक कम और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।
- डब्ल्यूएचओ के मुताबिक डिमेंशिया केवल बढ़ती उम्र की बीमारी नहीं है। जीवनशैली और पर्यावरण से जुड़े कई कारण इसे बढ़ाते हैं।
- इनमें वायु प्रदूषण (पीएम2.5), हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान, शराब का अधिक सेवन, डिप्रेशन समेत कई कारण शामिल हैं।
- डब्ल्यूएचओ ने गाइडलाइन में 2024 के लैंसेट कमीशन का हवाला देते हुए कहा है कि डिमेंशिया के करीब 45% मामलों से ऐसे जोखिम कारकों को जोड़कर देखा जाता है जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है।
भारत के लिए क्यों है चिंता?
भारत में करीब 10.4 करोड़ लोग 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं। विभिन्न भारतीय अध्ययनों के अनुसार, इस आयु वर्ग के करीब 6 से 7 प्रतिशत लोग किसी न किसी प्रकार के डिमेंशिया से प्रभावित हैं। यानी हर 100 भारतीयों में लगभग 6-7 लोगों को यह बीमारी है या उसका खतरा है।
आबादी के हिसाब से यह संख्या 60 से 70 लाख के बीच बैठती है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की आशंका है। डब्ल्यूएचओ भी मानता है कि कम और मध्यम आय वाले देशों में डिमेंशिया का बोझ तेजी से बढ़ रहा है।
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स्रोत:
New WHO guidelines: up to 45% of dementia risk could be prevented or delayed
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