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Arthritis Risk: महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा पुरुषों से अधिक, पर क्यों? यहां जानिए सबकुछ विस्तार से

Mon, 11 Aug 2025 09:59 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 11 Aug 2025 09:59 PM IST
सार

  •  पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा कहीं अधिक है। यह सिर्फ उम्र या कैल्शियम की कमी का मामला नहीं, बल्कि हार्मोनल बदलाव, इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रियाएं और जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं भी इसका खतरा बढ़ाने वाली हो सकती हैं।

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महिलाओं में गठिया की समस्या - फोटो : Freepik.com

आर्थराइटिस-जोड़ों में दर्द की समस्या, सभी उम्र के लोगों में देखी जा रही है। कुछ दशकों पहले तक इसे बस उम्र बढ़ने के साथ होने वाली दिक्कतों के तौर पर जाना जाता था हालांकि अब कम उम्र के लोग भी इसका शिकार हो रहे हैं।  सुबह उठते ही जोड़ों में जकड़न, सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों में दर्द, या हाथ-पैरों की उंगलियों में सूजन को अक्सर आप नजरअंदाज कर देते हैं तो ये गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है। ये आर्थराइटिस (Arthritis) के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। 



शोध बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा कहीं अधिक है। यह सिर्फ उम्र या कैल्शियम की कमी का मामला नहीं, बल्कि हार्मोनल बदलाव, इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रियाएं और जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं भी इसका खतरा बढ़ाने वाली हो सकती हैं।

क्या आप जानते हैं कि महिलाओं में आर्थराइटिस का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक होता है?

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गठिया का खतरा - फोटो : Freepik.com

महिलाओं में आर्थराइटिस के मामले

अमेरिकन कॉलेज ऑफ रूमेटोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि एस्ट्रोजन हार्मोन हड्डियों और जोड़ों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। मेनोपॉज (आमतौर पर 50 की उम्र) के बाद एस्ट्रोजन का स्तर कम होने से महिलाओं में हड्डियों और जोड़ों की मजबूती भी कम हो जाती है, जिससे आर्थराइटिस का खतरा बढ़ जाता है।

  • नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एमआईएच) की रिपोर्ट के अनुसार, रुमेटाइड आर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून डिजीज है जो महिलाओं में पुरुषों से 2-3 गुना ज्यादा अधिक देखी जाती है।
  • इसके अलावा गर्भावस्था और प्रसव के दौरान वजन बढ़ना और पेल्विक हड्डियों पर दबाव, आगे चलकर घुटनों और कूल्हों में आर्थराइटिस की संभावना बढ़ा देता है।
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आर्थराइटिस और इसके जोखिम कारक - फोटो : Freepik.com

क्यों बढ़ता जा रहा है ये जोखिम?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि 40 साल के बाद 60% महिलाओं में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। भारत में 70% महिलाएं विटामिन डी की कमी से जूझ रही हैं, जो जोड़ों की सेहत के लिए और भी दिक्कतें बढ़ाने वाली स्थिति हो सकती है।

हालांकि अच्छी बात ये है कि आप पहले से ही कुछ बातों का ध्यान रखकर आर्थराइटिस के जोखिमों को कम कर सकती हैं। शारीरिक गतिविधि की कमी, वजन बढ़ना और अनुचित खानपान आपमें गठिया का जोखिम बढ़ाने वाला हो सकता है, इसलिए जरूरी है कि आप लाइफस्टाइल को ठीक रखें। 

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हड्डियों की समस्याएं - फोटो : Freepik.com

किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?

सभी महिलाओं को आर्थराइटिस हो ये जरूरी नहीं है हालांकि कुछ लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। 

मेनोपॉज के बाद की महिलाओं को अधिक सावधान रहना चाहिए। हार्मोनल बदलाव जोड़ों को कमजोर करते हैं, जिससे आपको अधिक खतरा हो सकता है। इसके अलावा गर्भवती या हाल ही में मां बनी महिलाएं, जिनके परिवार में पहले से किसी को आर्थराइटिस की दिक्कत रही हो, अधिक वजन या मोटापा की शिकार महिलाओं में भी खतरा अधिक होता है, इन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

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हड्डियों का रखें ख्याल - फोटो : Freepik.com

आर्थराइटिस से बचे रहने के लिए क्या करें?

  • पौष्टिक आहार का सेवन जैसे  कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर चीजें दूध, दही, पनीर, हरी सब्जियां खाना आपके लिए फायदेमंद है। 
  • ओमेगा-3 फैटी एसिड (मछली, अखरोट, अलसी के बीज) और एंटी-इंफ्लेमेटरी फूड्स (हल्दी, लहसुन, अदरक) को भी आहार में शामिल करें। 
  • नियमित व्यायाम करें: हल्की स्ट्रेचिंग और योग जैसे अभ्यास फायदेमंद हैं। वॉकिंग, साइकिलिंग और तैराकी से जोड़ों को लचीला बनाए रखा जा सकता है।
  • अधिक वजन होने से भी घुटनों पर दबाव बढ़ जाता है, इसलिए वजन कम करें। 
  • हार्मोनल संतुलन बनाए रखने के लिए मेनोपॉज के बाद डॉक्टर से हड्डियों की सेहत को लेकर सलाह लें।



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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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