पिछले कई वर्षों की तरह दीपावली के बाद इस साल भी राजधानी दिल्ली सहित कई अन्य शहर गंभीर वायुप्रदूषण की चपेट में हैं। दीपावली के बाद राजधानी दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 300 तक पहुंच गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक 101 से 150 के एक्यूआई को अस्वस्थ, 150-200 को रोगकारक, 201-300 को खराब और 300 से अधिक को बहुत खराब-घातक वायु की श्रेणी में रखा गया है। जिस तरह से दिल्ली-एनसीआर में मौजूदा एक्यूआई है, इस तरह की हवा में सांस लेने से कई प्रकार की गंभीर बीमारियों का जोखिम हो सकता है। पटाखों के धुएं को मौजूदा वायु प्रदूषण के लिए प्रमुख कारक के तौर पर देखा जा रहा है।
सेहत को खतरा: प्रदूषण ने बिगाड़ी दिल्ली की आबोहवा, विशेषज्ञों ने यातायात प्रदूषण के जोखिमों को लेकर चेताया
खराब वायु गुणवत्ता हो सकती है जानलेवा
खराब वायु गुणवत्ता के सेहत पर होने वाले दुष्प्रभावों को जानने के लिए किए गए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसे बेहद खतरनाक पाया है। यूरोपीय एनवायरमेंटल एजेंसी (ईईए) के शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पीएम2.5) के लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में फेफड़ों, हृदय से संबंधित कई तरह की गंभीर और जानलेवा स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है।
वायु प्रदूषण के अल्पकालिक और लंबे समय तक संपर्क में रहने से स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, श्वसन संक्रमण और गंभीर स्थितियों में फेफड़ों के कैंसर तक का खतरा हो सकता है। सभी लोगों को प्रदूषण से बचने के उपाय करते रहने की आवश्यकता है।
यातायात प्रदूषण से डेमेंशिया का खतरा
शोधकर्ताओं ने एक हालिया अध्ययन में पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) के अधिक संपर्क में रहने वाले लोगों में कई प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को लेकर अलर्ट किया है। न्यूरोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया कि यातायात से जुड़े प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहने वालों में डेमेंशिया रोग विकसित होने का खतरा अधिक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि विशेषतौर पर PM2.5 के कारण कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिमों के बारे में पता चलता है, इससे डेमेंशिया का जोखिम भी देखा गया है।
वेस्टर्न यूनिवर्सिटी, लंदन में प्रोफेसर और अध्ययन के लेखक एहसान अबोलहासानी कहते हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट से पता चला है कि दुनिया की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी वायु प्रदूषण के अनुशंसित स्तर से अधिक वाले क्षेत्रों में रह रही है। हमारे परिणाम बताते हैं कि इस तरह का वातावरण लोगों में डेमेंशिया जैसे गंभीर रोगों के खतरे को बढ़ा रहा है।
क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?
वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों और इससे बचाव के तरीकों के बारे में जानने के लिए हमने मुंबई में वरिष्ठ श्वसन रोग विशेष डॉ विनीत चावला से संपर्क किया। डॉ विनीत कहते हैं, अक्तूबर-नवंबर के महीनों में पिछले कई वर्षों से महानगरों में वायु की गुणवत्ता को बिगड़ते हुए देखा जाता रहा है। 150 से अधिक की एक्यूआई में लंबे समय तक रहने वालों में कई प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम हो सकता है। इसे सिर्फ सांस की बीमारियों तक ही सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, खराब हवा न्यूरोलॉजिकल, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य विकारों के जोखिम को भी बढ़ा देती है। ऐसे वातावरण से बचाव करते रहना बहुत आवश्यक है।
कई गंभीर क्रोनिक बीमारियों का हो सकता है जोखिम
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बिगड़ती हवा की गुणवत्ता बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती के लिए गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है। इसके कारण डेमेंशिया से लेकर बच्चों में मस्तिष्क की संरचना में बदलाव, दिल के दौरे पड़ने और कैंसर तक का जोखिम बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाया कि वायु प्रदूषण का औसत से अधिक स्तर हृदय रोग से मृत्यु का जोखिम 17 प्रतिशत और अन्य गंभीर बीमारियों के कारण मौत के खतरे को 20 फीसदी तक बढ़ा देती है। गर्भवती का इस प्रकार के हवा के संपर्क में रहना भ्रूण की सेहत को लेकर भी चुनौती कारक हो सकता है।