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सिर्फ फर्टिलिटी की समस्या नहीं, आपकी पूरी मेटाबॉलिक हेल्थ पर असर डाल सकता है PMOS
Fri, 18 Sep 2026 11:07 AM IST
Shruti Gaur
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shruti Gaur
Updated Fri, 18 Sep 2026 11:07 AM IST
सार
PMOS Awareness Month: इस लेख में डॉक्टर से जानें कि PMOS सिर्फ फर्टिलिटी की समस्या नहीं है। चीफ पैथोलॉजिस्ट मायंका लोढ़ा सेठ से समझिए कैसे PMOS आपकी मेटाबॉलिक और हार्ट हेल्थ पर असर डालता है।
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मेटाबॉलिक हेल्थ पर कैसे असर डाल सकता है PMOS?
- फोटो : AI
PMOS Awareness Month: पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) को आमतौर पर अनियमित पीरियड्स, हार्मोनल असंतुलन और फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इसके प्रभाव सिर्फ रिप्रोडक्टिव हेल्थ तक सीमित नहीं हैं। PMOS शरीर की मेटाबॉलिक हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है और यही वह पहलू है जिस पर महिलाओं और डॉक्टरों दोनों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
मेटाबॉलिक हेल्थ पर कैसे असर डाल सकता है PMOS?
- फोटो : AI
PMOS में मेटाबॉलिक हेल्थ क्यों है महत्वपूर्ण?
डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के अनुसार, PMOS को सिर्फ ओवरी या फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या मानना इसके व्यापक प्रभाव को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस स्थिति में शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ सकता है, जिसके कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
इंसुलिन रेजिस्टेंस में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं। इससे शरीर को ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए अधिक इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। समय के साथ यह ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है।
PMOS में लिपिड प्रोफाइल में बदलाव और पेट के आसपास फैट का बढ़ना भी मेटाबॉलिक रिस्क का हिस्सा हो सकता है। इसलिए PMOS का आकलन करते समय सिर्फ पीरियड्स या ओव्यूलेशन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के अनुसार, PMOS को सिर्फ ओवरी या फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या मानना इसके व्यापक प्रभाव को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस स्थिति में शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ सकता है, जिसके कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
इंसुलिन रेजिस्टेंस में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं। इससे शरीर को ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए अधिक इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। समय के साथ यह ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है।
PMOS में लिपिड प्रोफाइल में बदलाव और पेट के आसपास फैट का बढ़ना भी मेटाबॉलिक रिस्क का हिस्सा हो सकता है। इसलिए PMOS का आकलन करते समय सिर्फ पीरियड्स या ओव्यूलेशन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
मेटाबॉलिक हेल्थ पर कैसे असर डाल सकता है PMOS?
- फोटो : AI
PMOS डायग्नोसिस के साथ मेटाबॉलिक रिस्क की जांच
रेडक्लिफ लैब्स की चीफ पैथोलॉजिस्ट डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के अनुसार, PMOS का पता चलना मेटाबॉलिक हेल्थ को जांचने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। इंटरनेशनल PMOS गाइडलाइन के मुताबिक, PMOS वाली महिलाओं में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर्स का आकलन किया जाना चाहिए और डायग्नोसिस के समय लिपिड प्रोफाइल की जांच की जानी चाहिए, चाहे महिला की उम्र या BMI कुछ भी हो।
इसका मतलब यह है कि PMOS की जांच सिर्फ हार्मोन और रिप्रोडक्टिव हेल्थ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर महिला की स्थिति के अनुसार ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल और अन्य जरूरी मेटाबॉलिक पैरामीटर्स का मूल्यांकन कर सकते हैं।
रेडक्लिफ लैब्स की चीफ पैथोलॉजिस्ट डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के अनुसार, PMOS का पता चलना मेटाबॉलिक हेल्थ को जांचने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। इंटरनेशनल PMOS गाइडलाइन के मुताबिक, PMOS वाली महिलाओं में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर्स का आकलन किया जाना चाहिए और डायग्नोसिस के समय लिपिड प्रोफाइल की जांच की जानी चाहिए, चाहे महिला की उम्र या BMI कुछ भी हो।
इसका मतलब यह है कि PMOS की जांच सिर्फ हार्मोन और रिप्रोडक्टिव हेल्थ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर महिला की स्थिति के अनुसार ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल और अन्य जरूरी मेटाबॉलिक पैरामीटर्स का मूल्यांकन कर सकते हैं।
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मेटाबॉलिक हेल्थ पर कैसे असर डाल सकता है PMOS?
- फोटो : AI
पीरियड्स या फर्टिलिटी की शिकायत बन सकती है शुरुआती संकेत
कई महिलाएं डॉक्टर के पास तब पहुंचती हैं जब पीरियड्स लगातार अनियमित हो जाते हैं या उन्हें कंसीव करने में परेशानी होती है। डॉ. सेठ के अनुसार, ऐसी स्थिति में डॉक्टर के पास आने का यह मौका केवल रिप्रोडक्टिव समस्या का इलाज करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसी दौरान महिला के मेटाबॉलिक रिस्क फैक्टर्स की भी जांच की जा सकती है। इससे ऐसे बदलावों का पता लगाया जा सकता है जो अभी कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दे रहे हैं।
यानी पीरियड्स की समस्या या फर्टिलिटी की परेशानी कई बार उस मेटाबॉलिक हेल्थ की ओर ध्यान दिलाने का शुरुआती मौका बन सकती है, जिस पर महिला ने शायद पहले ध्यान ही न दिया हो।
कई महिलाएं डॉक्टर के पास तब पहुंचती हैं जब पीरियड्स लगातार अनियमित हो जाते हैं या उन्हें कंसीव करने में परेशानी होती है। डॉ. सेठ के अनुसार, ऐसी स्थिति में डॉक्टर के पास आने का यह मौका केवल रिप्रोडक्टिव समस्या का इलाज करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसी दौरान महिला के मेटाबॉलिक रिस्क फैक्टर्स की भी जांच की जा सकती है। इससे ऐसे बदलावों का पता लगाया जा सकता है जो अभी कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दे रहे हैं।
यानी पीरियड्स की समस्या या फर्टिलिटी की परेशानी कई बार उस मेटाबॉलिक हेल्थ की ओर ध्यान दिलाने का शुरुआती मौका बन सकती है, जिस पर महिला ने शायद पहले ध्यान ही न दिया हो।
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मेटाबॉलिक हेल्थ पर कैसे असर डाल सकता है PMOS?
- फोटो : AI
PMOS को सिर्फ प्रेग्नेंसी प्लानिंग के समय याद करना सही नहीं
डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के बयान का सबसे बड़ा संदेश यही है कि PMOS को केवल उस समय गंभीरता से नहीं लेना चाहिए जब महिला प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हो।
PMOS लंबे समय तक चलने वाली स्थिति हो सकती है और इसका असर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के अलावा मेटाबॉलिक और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ पर भी पड़ सकता है। इसलिए इसका मैनेजमेंट भी सिर्फ पीरियड्स को नियमित करने या फर्टिलिटी पर केंद्रित नहीं होना चाहिए।
महिला की मेटाबॉलिक हेल्थ की नियमित निगरानी, जरूरत के अनुसार जांच और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक लाइफस्टाइल मैनेजमेंट PMOS की ओवरऑल केयर का हिस्सा हो सकते हैं।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
डॉ. मायंका लोढ़ा सेठ के बयान का सबसे बड़ा संदेश यही है कि PMOS को केवल उस समय गंभीरता से नहीं लेना चाहिए जब महिला प्रेग्नेंसी प्लान कर रही हो।
PMOS लंबे समय तक चलने वाली स्थिति हो सकती है और इसका असर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के अलावा मेटाबॉलिक और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ पर भी पड़ सकता है। इसलिए इसका मैनेजमेंट भी सिर्फ पीरियड्स को नियमित करने या फर्टिलिटी पर केंद्रित नहीं होना चाहिए।
महिला की मेटाबॉलिक हेल्थ की नियमित निगरानी, जरूरत के अनुसार जांच और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक लाइफस्टाइल मैनेजमेंट PMOS की ओवरऑल केयर का हिस्सा हो सकते हैं।
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।