कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच दुनियाभर के वैज्ञानिक इस वायरस की प्रकृति, लक्षण, प्रभाव से लेकर इसका इलाज ढूंढने तक के लिए शोधरत हैं। एक तरफ कोरोना संक्रमण का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर इससे ठीक होने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पिछले दिनों आए एक रिसर्च में बताया गया था कि समय के साथ इस वायरस का स्ट्रेन भी कमजोर हुआ है। शायद यही वजह है कि पहले की अपेक्षा लोग अब कम दिनों में ही ठीक हो जा रहे हैं। विशेषज्ञ इस बात की ओर भी इशारा कर चुके हैं कि बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो कोरोना संक्रमित हुए और अपने आप ठीक भी हो गए। इसी संबंध में एक नया शोध अध्ययन सामने आया है।
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Coronavirus Cure: कोरोना से लड़ने में सक्षम है एक तिहाई आबादी, इस शोध अध्ययन में हुआ खुलासा
Thu, 02 Jul 2020 02:35 PM IST
निलेश कुमार
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: निलेश कुमार
Updated Thu, 02 Jul 2020 02:35 PM IST
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Coronavirus Update
- फोटो : Pixabay/Amar Ujala
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Coronavirus
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- स्वीडन स्थित कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने अपने हालिया शोध अध्ययन में दावा किया है कि एक तिहाई आबादी में कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम है। यानी 33 फीसदी आबादी में कोरोना से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है। यह आंकड़ा पूर्व में अनुमानित संख्या से लगभग दोगुना है।
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- शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के दौरान स्वस्थ रक्तदाताओं के खून के नमूनों का विश्लेषण कर यह जांचने की कोशिश की कि कोरोना वायरस से मानव शरीर आखिर कैसे लड़ता है। उन्होंने इस अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों के शरीर में कोरोना रोधी एंटीबॉडी और 'टी कोशिकाओं' का स्तर आंका। 'टी कोशिकाएं' एक तरह की श्वेत रक्त कोशिकाएं हैं, जो प्रतिरोधक तंत्र को वायरस से लड़ने की क्षमता देती है।
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नमूना लेते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो)
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- शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के दौरान पाया कि पूर्वानुमान से दोगुनी आबादी में कोरोना से लड़ने की ताकत पैदा हो गई है। अब 30 फीसदी से ज्यादा लोग इस वायरस को मात देने में सक्षम हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह प्रतिरक्षा सिर्फ एंटीबॉडी के कारण नहीं है, बल्कि वायरस संक्रमण से बचाने में 'टी कोशिकाएं' ज्यादा अहम भूमिका निभा रही हैं।
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नमूनों की जांच करते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
- इस शोध अध्ययन में मुख्य शोधकर्ता मार्कस बगर्ट का कहना है कि एंटीबॉडी के मुकाबले ‘टी-कोशिकाएं’ सुरक्षा कवच के तौर पर लोगों में विकसित हो गई हैं। एंटीबॉडी की मदद से वायरस के हमले से महज तीन से छह हफ्ते तक ही बचा जा सकता है। हालांकि ये 'टी कोशिकाएं' कोरोना के खिलाफ कितनी लंबी अवधि तक कारगर होगी, इसे आंकना बाकी है।