वायु प्रदूषण वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। जब भी वायु प्रदूषण की चर्चा होती है, सबसे पहले फेफड़ों, सांस की बीमारी, अस्थमा, दिल और कैंसर जैसे खतरे सामने आते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि हवा में घुले बेहद छोटे कणों का असर इससे कहीं खतरनाक हो सकता है? अध्ययनों में पाया गया है कि वायु प्रदूषण फेफड़ों के अलावा मस्तिष्क, तंत्रिकाओं के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य: क्या प्रदूषण वाली जगहों पर रहना बढ़ा रहा है आत्महत्या का खतरा? शोध में बड़ा खुलासा
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क के कारण आत्महत्या के विचार, आत्महत्या की कोशिश और मौत के बीच संबंध पाया गया। पीएम 2.5, पीएम 10 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषक सबसे खतरनाक पाए गए हैं।
वायु प्रदूषण का मानसिक स्वास्थ्य पर खतरनाक असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पीएम 2.5 और पीएम 10 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं। पीएम 2.5 इतने महीन होते हैं कि सांस के साथ शरीर के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं। वहीं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड मुख्यरूप से वाहनों और ईंधन जलने जैसी गतिविधियों से निकलने वाली गैस है। ऐसे प्रदूषकों का संपर्क रोजमर्रा की जिंदगी में कई लोगों के लिए लगातार बना रहता है।
ब्रिटेन की क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के शोधकर्ताओं ने 29 अध्ययनों के नतीजों की समीक्षा की। इसमें कम समय और लंबे समय के प्रदूषण संपर्क, दोनों को देखा गया। नतीजों ने एक अहम सवाल खड़ा किया है कि क्या जिस हवा में हम रोज सांस लेते हैं, उसका असर हमारे दिमाग और भावनाओं तक को भी प्रभावित कर सकता है?
- जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट में शोधकर्ताओं का कहना है कि आत्महत्या रोकने की रणनीति में पर्यावरण से जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
- मानसिक स्वास्थ्य समस्या के शिकार लोगों को प्रदूषण से बचाकर गंभीर खतरों को कम किया जा सकता है।
आत्महत्या के विचार बढ़ने का खतरा
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि आत्महत्या का जोखिम केवल किसी एक वजह से तय नहीं होता। इसमें व्यक्तिगत परिस्थितियां, शरीर और दिमाग से जुड़े जैविक कारण और आसपास का सामाजिक या पर्यावरणीय माहौल, सभी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए आत्महत्या की रोकथाम को केवल मानसिक स्वास्थ्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी माना जाना चाहिए।
हालांकि प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों को लेकर पहले भी काफी अध्ययन हुए हैं। खासतौर पर अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं पर शोध हुआ है। लेकिन प्रदूषण का आत्महत्या के जोखिमों से क्या संबंध है, इस बारे में जानकारी अभी अपेक्षाकृत कम है।
- इस समीक्षा में शोधकर्ताओं ने पाया कि कम समय के लिए पीएम 2.5 और पीएम 10 के संपर्क से भी आत्महत्या से मौत, आत्महत्या की कोशिश और आत्महत्या के विचार आने के जोखिम बढ़ जाता है ।
- सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और नॉइस पॉल्यूशन जैसे दूसरे पर्यावरणीय कारकों का भी आत्महत्या से संबंध हो सकता है, लेकिन इनके बारे में अभी और शोध की जरूरत है।
- इन नतीजों से यह बात सामने आती है कि आत्महत्या रोकने की कोशिशों में पर्यावरणीय जोखिमों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- खासकर ऐसे जोखिम, जिनमें प्रदूषण कम करके लोगों के संपर्क को घटाया जा सकता है।
प्रदूषण कैसे बढ़ा रहे हैं आत्महत्या के खतरे
शोधकर्ताओं ने इसके कारणों को समझाते हुए बताया कि आर्सेनिक, लेड, लिथियम या नाइट्रेट जैसे पदार्थों से होने वाला वायु और जल प्रदूषण, क्रॉनिक इंफ्लेमेशन और तंत्रिका तंत्र पर असर डाल सकता है। तंत्रिका तंत्र वह व्यवस्था है जो दिमाग और शरीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाती है।
- क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन और नसों को नुकसान के कारण दिमाग के सामान्य कामकाज पर असर पड़ सकता है और व्यक्ति के मूड तथा तनाव से निपटने की क्षमता में बदलाव आ सकता है।
- इसी तरह ट्रैफिक और दूसरे पर्यावरणीय शोर के साथ-साथ रोशनी का प्रदूषण भी तनाव बढ़ाने से जुड़ा हो सकता है।
- लगातार शोर या रात में ज्यादा रोशनी शरीर की बॉडी क्लॉक यानी सोने-जागने और शरीर के दूसरे कामों को नियंत्रित करने वाली प्राकृतिक घड़ी को प्रभावित कर देती है, जिसके कारण तनाव प्रबंधन और समस्याओं से निपटना कठिन हो जाता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन हेल्थ के प्रोफेसर बेन मुलिंस कहते हैं, यह उन शुरुआती बड़े विश्लेषणों में से एक है, जिसमें वायु प्रदूषण और आत्महत्या के बीच संबंध को एक साथ कई अध्ययनों के आधार पर देखा गया है। यह पहले से पता है कि कई वायु प्रदूषक शरीर और दिमाग पर अलग-अलग तरह के तंत्रिका संबंधी प्रभाव डाल सकते हैं। इनका संबंध अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं से भी देखा गया है।
हालांकि प्रोफेसर मुलिंस कहते हैं, अध्ययनों का सैंपल साइज छोटा था। साथ ही, शोधकर्ताओं ने ऐसे दूसरे कारणों को पर्याप्त रूप से नहीं देखा, जो नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इसकी पुष्टि करने के लिए और ज्यादा अध्ययनों की जरूरत है।
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स्रोत:
Environmental exposure and risk of death by suicide, attempted suicide and suicide ideation: a systematic review and meta-analysis
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