मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बावजूद, आज भी 'डिप्रेशन' को लेकर कुछ लोगों के मन में कई तरह के भ्रम मौजूद हैं। अक्सर लोग थकान, उदासी या एकाग्रता में कमी को सीधे तौर पर डिप्रेशन मान लेते हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कई शारीरिक बीमारियां ऐसी हैं जिनके लक्षण डिप्रेशन जैसे दिखाई देते हैं। इसे 'मिमिक्री ऑफ डिप्रेशन' कहा जाता है। उदाहरण के लिए, थायराइड की गड़बड़ी या शरीर में विटामिन की भारी कमी आपके मूड को इस कदर प्रभावित कर सकती है कि लोग खुद को मानसिक रूप से बीमार समझने लगते हैं।
इन बीमारियों और डिप्रेशन के बीच बहुत ही बारीक अंतर होता है, जिसे सामान्यतौर पर चिकित्सा परीक्षण से ही पहचाना जा सकता है। अगर मूल बीमारी शारीरिक है और आप डिप्रेशन का इलाज कर रहे हैं, तो समस्या कभी पूरी तरह ठीक नहीं होगी। इसलिए, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह समझना जरूरी है कि शरीर के अंदर चल रही उथल-पुथल आपके मस्तिष्क के रसायनों को कैसे प्रभावित कर रही है। इन डिप्रेशन जैसी लक्षणों वाली बीमारियों की पहचान करना ही सही उपचार की पहली सीढ़ी होती है जिसके बारे में आपको भी जानना चाहिए।
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थायरॉइ़ड
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थायराइड विकार और मानसिक स्थिति
हाइपोथायरायडिज्म में जब थायराइड ग्रंथि पर्याप्त हार्मोन नहीं बनाती, तो मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है। इसके कारण व्यक्ति को अत्यधिक थकान, सुस्ती और उदासी महसूस होती है, जो बिल्कुल डिप्रेशन के शुरुआती लक्षणों जैसे होते हैं। अगर आप बिना किसी ठोस कारण के उदास महसूस कर रहे हैं, तो मनोचिकित्सक से मिलने से पहले एक बार 'टी-एस-एच' टेस्ट जरूर करवाएं, क्योंकि हार्मोनल असंतुलन आपके मूड का सबसे बड़ा दुश्मन हो सकता है।
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विटामिन डी
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विटामिन-D और B12 की भारी कमी
शरीर में विटामिन-D और B12 की कमी सीधे तौर पर 'सेरोटोनिन' जैसे हैप्पी हार्मोन्स के उत्पादन को प्रभावित करती है। विटामिन B12 की कमी से नसों में कमजोरी और याददाश्त में धुंधलापन आता है, जिसे लोग अक्सर 'डिप्रेसिव फॉग' समझ लेते हैं। वहीं, 'सनशाइन विटामिन' यानी विटामिन-D की कमी से हड्डियों में दर्द के साथ-साथ गंभीर चिड़चिड़ापन पैदा होता है। इन विटामिनों के लेवल को ठीक करते ही मानसिक स्थिति में बड़ा सुधार देखा जा सकता है।
एनीमिया और क्रोनिक फटीग सिंड्रोम
जब शरीर में आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन कम हो जाता है, तो मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है। जिसकी वजह से व्यक्ति हर समय निरुत्साहित और थका हुआ महसूस करता है। इसी तरह क्रोनिक फटीग सिंड्रोम में व्यक्ति को बिस्तर से उठने तक की ऊर्जा महसूस नहीं होती। ये शारीरिक स्थितियां व्यक्ति को सामाजिक रूप से कटने पर मजबूर कर देती हैं, जिसे अक्सर क्लीनिकल डिप्रेशन का नाम दे दिया जाता है।
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अवसाद के शुरुआती संकेत
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सही पहचान ही है बचाव का रास्ता
डिप्रेशन और इन शारीरिक बीमारियों के बीच अंतर करने के लिए 'लिपिड प्रोफाइल' और 'ब्लड काउंट' जैसे बेसिक टेस्ट करवाना जरूरी हैं। अगर एंटी-डिप्रेसेंट दवाओं के बावजूद सुधार नहीं हो रहा है, तो समस्या शारीरिक हो सकती है। अपनी जीवनशैली में सुधार करें, धूप लें और पोषक तत्वों से भरपूर आहार लें। ध्यान रखें हर मानसिक उलझन का कारण केवल दिमाग नहीं होता, कभी-कभी शरीर की छोटी सी कमी भी बड़े मानसिक बदलाव ला सकती है।
नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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